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Samar kabeer's Blog – August 2015 Archive (5)

ग़ज़ल :- अपनी बहना के नाम एक ग़ज़ल

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन


अपनी बहना के नाम एक ग़ज़ल
मेरी चाहत का है ये चेक ग़ज़ल

पाक जज़्बात इसमें शामिल हैं
इसलिये कह रहा हूँ नेक ग़ज़ल

एक शाइर की दोनों औलादें
एक व्हाइट है इक ब्लेक ग़ज़ल

इसके जादू से कौन बच पाया
सबके दिल पर करे अटेक ग़ज़ल

ग़म के मारों को मिल रहा है सुकूँ
दर्द पर कर रही है सेक ग़ज़ल

है गुज़ारिश, "समर" सुनाओ हमें
डायरी में करो न पेक ग़ज़ल

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on August 28, 2015 at 10:46pm — 9 Comments

ग़ज़ल :- महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



सभी कहते हैं मुझको भी 'समर' अच्छा नहीं लगता

महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता



ख़ुदा का दीन सबको अम्न का पैग़ाम देता है

हो बे अमनी ख़ुदा के नाम पर अच्छा नहीं लगता



जो हैं नादान वो इसके लिये लड़ते हैं आपस में

जो दाना हैं उन्हें ये माल-ओ-ज़र अच्छा नहीं लगता



मेरी इस बात की यारों दलील-ए-मुस्तनद ये है

वो मेरे साथ क्यों होते अगर अच्छा नहीं लगता



शरारत और शौख़ी ही भली मालूम होती है

किसी भी… Continue

Added by Samar kabeer on August 25, 2015 at 5:18pm — 19 Comments

ग़ज़ल :- जो समझा आपने ऐसा नहीं मैं

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



जो समझा आपने ऐसा नहीं मैं

मुसलमाँ हूँ ,मगर सच्चा नहीं मैं



मैं सच हूँ,और हमेशा सच रहूँगा

किसी भी झूट से डरता नहीं मैं



दुआओं से मुझे फ़ुर्सत नहीं थी

तुम्हारी याद में रोया नहीं मैं



कटी ऐसे ही सारी रात यारों

वो बहलाते रहे ,बहला नहीं मैं



मुझे तो आब-ए-कौसर की तलब है

तिरे दरियाओं का प्यासा नहीं मैं



मिरा "मसरूर" अक्सर बोलता है

बड़ा समझो मुझे बच्चा नहीं मैं



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on August 17, 2015 at 10:48pm — 19 Comments

ग़ज़ल :- मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



भले लिख दो,मिरा ग़म हाशिये पर

मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर



अँधेरा इस क़दर फैला हुवा था

नज़र सबकी थी छोटे से दिये पर



मिरा कुछ बोझ हल्का हो गया है

मिरे बच्चों ने भी अब ले लिये पर



तुम्हारे हुस्न पर मिसरा लिखा था

कई शर्तें लगी थीं क़ाफ़िये पर



मिरी ग़ज़लो प सर धुंते हैं अपना

ये देंगे दाद मेरे मर्सिये पर



सभी शाइर समझ बैठे हैं उसको

किसी को शक नहीं बहरूपिये पर



"समर",ये लफ़्ज़ बे… Continue

Added by Samar kabeer on August 10, 2015 at 11:15pm — 15 Comments

तरही ग़ज़ल

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन



सब छोड़ छाड़ हम्द-ओ-सना में लगा रहा

आफ़त पड़ी जो सर प दुआ में लगा रहा



अब उससे नेकियों की तवक़्क़ो फ़ुज़ूल है

जो सारी उम्र जुर्म-ओ-सज़ा में लगा रहा



सीने में अपने झाँक के देखा नहीं कभी

हर सम्त वो तलाश-ए-ख़ुदा में लगा रहा



हिम्मत थी जिसमें ,छीन लिया बढ़ के अपना हक़

मजबूर था जो आह-ओ--बुका में लगा रहा



अच्छाई उसको छू के भी गुज़री नहीं कभी

उसका दिमाग़ सिर्फ़ ख़ता में लगा रहा



मैंने तो जान बूझ के धोया…

Continue

Added by Samar kabeer on August 5, 2015 at 11:30pm — 19 Comments

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