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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – August 2016 Archive (6)

बाज आता नहीं सिखाने से-ग़ज़ल

2122 1212 22



जाके कह दीजिए ज़माने से

वक़्त छीने कमाने खाने से



यूँ समस्याएं खत्म क्या होंगी

सिर्फ़ इल्ज़ाम भर लगाने से



काम सरकार ग़र नहीं करती

किसने रोका है कर दिखाने से



बैठ टेली विज़न के आगे यूँ

दिन बहुर जाएगा न गाने से



खुद को बदले बिना न रुक सकता

पाप बस शोर यूँ मचाने से



मुद्दे ऐसे तो हल नहीं होंगे

राग-ढपली अलग बजाने से



देश खुद ही प्रगति के पथ होगा

भार हर एक के उठाने से



मानता ही… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 28, 2016 at 11:16am — 13 Comments

सच से कम कुछ कहा नहीं जाता- ग़ज़ल

2122 1212 22



गुमशुदा यूँ रहा नहीं जाता

घुट के हमसे मरा नहीं जाता



रौशनी की बहुत ज़रूरत है

इसलिए ही बुझा नहीं जाता



आँख मन से जुड़ी है सीधे ही

सोचने से बचा नहीं जाता



लेखनी ताक़ पर मैं रख देता

दिल बिना तो जिया नहीं जाता



हाँ; जी पढ़ता नहीं कोई पुस्तक

कर्ज़ लेकर लिखा नहीं जाता



है तो दुनिया बड़ा सरोवर पर

नीर के बिन खिला नहीं जाता



दुश्मनी पालिये भले साहिब

सच से कम कुछ कहा नहीं जाता



राह… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2016 at 9:00pm — 7 Comments

बिलखते हैं बच्चे , सिसकती हैं माएँ मनाएं भला जश्न कैसे बता दो------------ग़ज़ल

122 122 122 122 122 122 122 122

अभी जाने कितने घरों में न चूल्हा

न जाने ही कितनों के घर, ये तो जानो।

बहुत कीमती फोन हाथों में लेकर

वो नेता बताता दिखा मीडिया को।।1।।



सफेदी थी झक्कास गाड़ी गज़ब की

सफ़ारी थी शायद औ मॉडल नया था।

गरीबी पे व्याख्यान देकरके जिसमें

मसीहा गरीबों का चढ़कर गया, वो।।2।।



परिस्थिति पे घड़ियाली आँसू बहाकर

तसल्ली बहुत दे गया था जो नेता।

मदद को बुलाया था आवास पर ही

मिटाये कहाँ दाग मन पर दिया ,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 17, 2016 at 3:30pm — 4 Comments

मन्त्र जन्मेजयी पे ये भी अधर डोले हैं-gazal

2122 1222 1212 22



शख्स हर वक्त जो नफ़रत का ज़हर घोले हैं।

खुद को शाइर भला वो जाने कैसे बोले हैं।।



क़ौम की एकता के नाम पर जो भड़काते।

ऐसे बहुरूपिये गिरगिट से बदले चोले हैं।।



मज़हबी आचरण जो सबका जाँचते अक्सर।

पूछिये क्या कभी वो लोग खुद को तोले हैं?



तालियाँ घर के ही लोगों ने जो बजा दी तो।

अपनी औकात से वो ज़्यादा ज़ुबाँ खोले हैं।।



झंडाबरदार-ए-ईमान जो बने खुद से।

वो तो साहित्य की गर्दन पड़े सपोले हैं।।



भक्त पंकज…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 7, 2016 at 7:30pm — 4 Comments

सिर्फ विभीषण बनता है- ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 22 2



अधरों पर झूठी मुस्कान, जिसमें भरी कुटिलता है।

सच तो ये है हे भैय्या जी, खद्दर उसी पे जँचता है।।



जाग रहे लोगों से भारत वासी का कब हृदय मिला।

जो संसद में ही सोता हो, वो ही असली नेता है।।



विष का घूँट तुम्हारी ख़ातिर, जो पी ले वो पागल है।

बीच सदन पव्वा ले बैठे, मान उसी का होता है।।



युग बदला परिभाषा बदली, गद्दारी क्या होती है?

भारत का आदर्श आज कल, सिर्फ विभीषण बनता है।।



साक्षरता के दर के आंकड़े, पर मत जाओ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2016 at 10:03pm — 4 Comments

लजाते क्यूँ हो?

2122 2122 22

अपने बच्चों को आज़माते क्यूँ हो?
निर्धनों को यूँ सताते क्यूँ हो?

वो तो वैसे ही है अभिशापित; फिर।
ख़्वाब मुफ़लिस को दिखाते क्यूँ हो?

जो कि रिश्ते में #भसुर# है धन का।
उसको महफ़िल में बुलाते क्यूँ हो?

जिसकी कुटिया में नहीं दरवाज़े।
बाप बेटी का बनाते क्यूँ हो?

मैं ख़फ़ा हूँ तेरी मनमानी से।
सामने आओ लजाते क्यूँ हो?

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 2, 2016 at 6:12pm — 4 Comments

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