For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

July 2015 Blog Posts (243)

मैं

नही आता लगाना दिल करे हम क्‍या बताओ तुम

हकीकत जिन्‍दगी की याद मुझको मत दिलाओ तुम

 कभी बचपन नही देखा जवानी फर्ज में गुजरे

रहा तन्‍हा हमेशा मैं न मेरे पास आओ तुम

हुआ था प्‍यार मुझको भी मगर वो भूल थी मेरी

निभा सकता न अब मैं प्‍यार मुझसे दूर जाओ तुम

ग़ज़ल कहता नहीं हूँ मैं नहीं मैं गीत हूँ लिखता

लिखूँ आवाज बस दिल की न उसको गुनगुनाओ तुम

मिले है दर्द लाखो पर सदा ही मुस्‍कुराता हूँ

छुपे जो अश्‍क…

Continue

Added by Akhand Gahmari on July 18, 2015 at 12:30pm — No Comments

चट्टे-बट्टे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘मंत्री जी ! ‘भाई’ अब फिर से नयी ‘डिमांड’ कर रहा है। पिछले हफ्ते डी.आई.जी. साहिब को ‘सेवा’ पहुँचाई है और अभी ‘पार्टी फंड’ भी जमा करवाना है । आपको तो पता ही है कि आपके इलेक्शन के वक्त भी हम किसी भी तरह पीछे नहीं हटे थे।  तो फिर कभी ‘भाई’ तो कभी पुलिस।  ऐसे कैसे चलेगा ?’

‘अरे परेशान काहे हो रहे हो। अब अकेले तुम्हारी वजह से ही तो इलेक्शन नहीं न जीते हैं हम... सभी ने साथ दिया था हमारा और ध्यान भी तो सभी का ही रखना पड़ेगा ना। और तुम घबरा काहे रहे हो, ऊ ससुरा जो पुल बना रहे हो ना उसमें से दो…

Continue

Added by Ravi Prabhakar on July 18, 2015 at 12:08am — 9 Comments

शादी की ज्यामितीय परिभाषा

दो सरल रेखाएं

जब एक बिंदु पर आकर मिलती हैं

एक ऋजु कोण का निर्माण करती हैं

ऋजु कोण से अधिक कोण

क्रमश:

घटती दूरी

और

फिर न्यून कोण

न्यूनतम करती हुई   

दोनों रेखाएं एक दूसरे से मिल जाती है

तब उनके बीच बनता है- शून्य कोण

समय की चोट खाकर

दोनों रेखाएं

अलग होती हुई

सामानांतर बनती है

और

अनन्त पर जाकर मिलती हैं

या फिर विपरीत दिशाओं में

और दूर

और दूर

होती…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 17, 2015 at 8:55pm — 8 Comments

हिन्दी का विकास

क्यारी देखी फूल बिन ,माली हुआ उदास ।

कह दी मन की बात सब, जा पेड़ों के पास ॥

हिन्दी को समृद्धि करन हित, मन में जागी आस ।

गाँव गली हर शहर तक ,करना अथक प्रयास ॥

कदम बढ़ाओ सड़क पर ,मन में रख कर विश्वाश ।

मिली सफलता एक दिन ,सबकी पूरी आश ॥

सूरज चमके अम्बर में , करे तिमिर का नाश ।

अज्ञानता का भय मिटे, फैले जगत प्रकाश ॥

चंदा दमकी आसमान  ,गई जगत में छाय ।

हिन्दी पहुंची जन जन में, तब बाधा मिट जाय ॥

हिन्दी हमारी ताज अब, सबको रख कर पास…

Continue

Added by Ram Ashery on July 17, 2015 at 6:54pm — 3 Comments

अग्नि परीक्षा (लघुकथा)

लघुकथा - अग्नि परीक्षा –

"रचना, तू यह क्या कर रही है, मुझे तो यह तेरा कदम सही नहीं लग रहा, पति पत्नी के बीच की दरार को जितनी जल्दी हो घटाना चाहिये पर तू तो और बढा रही है "!

"मॉ ,अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है,अब मेरी बर्दास्त की सीमा समाप्त हो चली है, हर वक्त ताने"!

"नहीं बेटी ,स्त्री की बर्दास्त का तो कभी अंत ही नहीं होता, फ़िर तेरे साथ तो दो बच्चों का भी जीवन जुडा है"!

"मॉ ,झगडे की मुख्य वज़ह भी तो ये बच्चे ही हैं, राकेश तो यह मानने को तैयार ही नहीं कि ये बच्चे…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on July 17, 2015 at 11:30am — 4 Comments

भीख ( लघुकथा )

" इतने पैसे नहीं हैं मेरे पास , सोच समझ कर माँगा और खर्च किया करो ", पति की आवाज़ उसके मन को मथ रही थी | काश उसने भी नौकरी की होती तो आज पार्टी के लिए पैसे मांगने की नौबत तो नहीं आती | यही सब सोचती किचन की ओर बढ़ी थी कि अचानक उसके कदम ठिठक गए | दरवाजे से उसकी नज़र पड़ गयी थी कामवाली पर जो नीचे रखे प्लेट्स में से निकाल कर पूरी वगैरह अपने पल्लू में बांध रही थी |

फिर उसने एक प्लेट में ढेर सारा खाने का सामान रखा और थोड़ी दूर से आवाज़ लगायी " बाई , ये प्लेट भी धुलने में रख देना "|

उसे बाई को…

Continue

Added by विनय कुमार on July 16, 2015 at 10:38pm — 12 Comments

बंधन (लघुकथा)

बंधन 

------

डाक्टर श्रीवास्तव की शुरू से आदत रही कि वे खुद और उनका स्टाफ समय पर अस्पताल पहुँचे। ज्यादातर वे समय से पहले अस्पताल पहुँच जाते ताकि अन्य राजकीय औपचारिकताओं के निर्वहन में खर्च होने वाले समय की प्रतिपूर्ति की जा सके और अधिक से अधिक मरीज देखे जा सकें। अपने सरल स्वभाव और मानवीय संवेदनाओं में अग्रणी होने के नाते क्षेत्र में बहुत लोंक प्रिय थे। मरीजों की भीड़ लगी थी और डाक्टर साहब तल्लीन थे सेवा भाव में। तभी मंत्री जी का आगमन हुआ। मंत्री का रूतबा और दबदबा दोनों ही कुछ ज्यदा…

Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल : ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

बह्र : १२२ १२२ १२२ १२२

ख़ुदाई जब आए हुनर में उतर कर

ख़ुदा बोलता है बशर में उतर कर

 

भरोसा न हो मेरी हिम्मत पे जानम

तो ख़ुद देख दिल से जिगर में उतर कर

 

इसी से बना है ये ब्रह्मांड सारा

कभी देख लेना सिफ़र में उतर कर

 

महीनों से मदहोश है सारी जनता

नशा आ रहा है ख़बर में उतर कर

 

तेरी स्वच्छता की ये कीमत चुकाता

कभी देख तो ले गटर में उतर कर

------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:14pm — 12 Comments

जरुरी नहीं ( कविता )

जरुरी नहीं कि हम दोषी हों

मिल जाती है सजा

अक्सर निरपराध को भी

हो जाती हैं दुर्घटनाएं

बिना हमारी गलती के भी

जरुरी नहीं कि लोग

हमसे खुश ही हों

बिना वज़ह भी हो जाती हैं

गलतफहमियां

और बिगड़ जाते हैं रिश्ते

जरुरी नहीं कि जो हम सोचें

वो सही ही हो

क्यूंकि हर चीज़ का

होता है एक दूसरा भी पहलू

जो नहीं देख पाते हम

जरुरी नहीं कि हम जन्म लें

एक ऐसे वातावरण में

जो हो जीने के लिए आदर्श

पर ये बहुत जरुरी है कि

बनायें…

Continue

Added by विनय कुमार on July 16, 2015 at 4:03pm — 6 Comments

ऊंचाई की तन्हाई ( लघु कथा)

रामप्रकाश बाबू ने बस थोड़ी सी बेवफाई ही तो शुरू किया दफ्तर में अपने  ईमान से कि सब जादू सा बदलने लगा . ईमान का स्तर थोडा नीचे क्या किया,रहन सहन ,खान-पान ,ऐश-मौज सबका स्तर ऊंचा होते गया . उड़ान ने ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि साथ के यार दोस्त वहीँ नीचे ही रह गएँ .

होली का दिन था ,शहर की महँगी मिठाइयाँ टेबल पर सजी रखी  हुई थीं . यारों की टोली आ रही थी......... लेकिन ये क्या कोई उनकी तरफ आया ही नहीं उन्होंने हाथ भी हिलाया पर सब आपस में मशगूल थें .आज अलमारी में रखे  नोटों पर हाथ फिराने इच्छा नहीं हुई…

Continue

Added by Rita Gupta on July 16, 2015 at 12:30pm — 5 Comments

लघु कथा - मुर्गी का अंडा –

लघु कथा - मुर्गी का अंडा –

 नज़ीर भाई और रसूल मियां वर्षों से पडौसी थे!नज़ीर भाई की टैक्सियां चलती थी और रसूल मियां घर के पिछवाडे ही मुर्गी पालन और अंडे बेचने का काम करते थे!

एक दिन एक मुर्गी नज़ीर भाई के अहाते में घुस गयी!पीछे पीछे रसूल मियां उसे पकडने दौडे!रसूल मियां ने देखा कि मुर्गी ने नज़ीर भाई के अहाते में अंडा दे दिया!नज़ीर भाई ने अंडा उठा लिया!रसूल मियां ने मुर्गी को पकड लिया,साथ ही नज़ीर भाई से अंडा भी मांगने लगे!

नज़ीर भाई साफ़ मुकर गये,"अरे रसूल मियां ,यह अंडा तो मैं…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on July 16, 2015 at 11:51am — 10 Comments

तलाश

तलाश
-------
निकल पड़ा हूँ
रोज की तरह आज भी
तलाश में ?
रोटी की

गोल हो , पतली या मोटी
जली काली , सफ़ेद
क्या फर्क
स्वाद तों एक ही होगा


कैसे ढूंढ लेते हो
अंतर
पांच सितारा होटल के नीचे पड़े
बजबजाते कूड़े में पडी
और
सुखिया के चूल्हे में सिंकी
सोंधी गंध वाली रोटी में


तुम्हें पता है ?
भूख कैसी होती है ?
मैं जानता हूँ।


मौलिक और अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 11:45am — 4 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

 २२    २२  २२  २

------------------------------------------------------------

यार कभी तू ऐसा कर

रस्ता मेरा देखा कर

याद किया बरसों तुझको

इक पल तू भी सोचा कर

अपने दाम लगा फिर तू

हाट लगा कर बेचा कर

सूरज चाँद पकड़ने में

जुगनू को मत छोड़ा कर

फोन खरीदा महँगा तो

इक दो कॉल मिलाया कर

बन झूठा बीमार कभी

रस्ता सबका ताका कर

तेरा भी है नाम…

Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on July 16, 2015 at 11:17am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - हर औरत में सुरसा भी है, और सभी में सीता है ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   22   22   2   --- 

पेडों पर इल्जाम लगा वो ख़ुद की खातिर जीता है

सोच रहा हूँ मैं सागर क्या अपना पानी पीता है ?

 

झूठा- सच्चा , सही ग़लत ये सब बे पर की बातें हैं

दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है

 

सभी उँगलियाँ अलग हो गईं अहम बीच में आने से

चुल्लू में कुछ रुका नहीं , जो रीता था, वो रीता है 

 

शब्द कोश बस रट लेने से भाव नहीं पैदा होता

व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 16, 2015 at 7:39am — 15 Comments

पहुँच-मार्ग --- डाo विजय शंकर

विद्यालय का भवन बन कर तैयार था, आज उसके अधिग्रहण की कार्यवाही हो रही थी , सब लोग नवनिर्मित-भवन के राउंड पर थे। प्राचार्य जी, दबी जबान बड़े इंजीनियर साहब को कमियां गिनवा रहे थे , बाथरूम में फर्श पर पानी रुक रहा है, सर, बहुत सी खिड़कियों के दरवाजे बंद ही नहीं हो रहें हैं, और सर.…… , सबसे बड़ी बात, मुख्य सड़क से भवन तक पहुंच- मार्ग तो अभी बना ही नहीं , उसे जरूर बनवा दीजिये सर.

" अरे आप तो व्यर्थ परेशान हो रहे हैं , प्रिंसिपल साहब, पहुंच- मार्ग तो स्टूडेंट्स के चलने से अपने आप बन जाएगा , इतना… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 1:00am — 10 Comments

बेबस इमान (बेईमानी का थिल्हाव)

ईमानदारी

कही न कही

हर बार हार कर...

अकेले में मुझसे

बस

सुगबुगाते

बात करती है ...

और मन ही मन

बड़ी पंडित बन

इमान को दरिद्रा स्थित

पर

दुद्कारती है....



ईमान

अपनी परिस्थित को

चुप चाप

फटी सी साफी

में पोंछ लेता है....

और

सांसे

एक आह ले

अपनी बेज्जती सह

प्रवाह मंद कर

बहतीं हैं...

आज परिस्थित ही

ऐसी है ....

सच की ......

यह मुह उठा कर

कभी जवाब नहीं

देता… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:10am — No Comments

विद्यालय ....(भविष्य)

दरवाजे से घुसता
चला आ रहा था भविष्य ...
मेरे भारत का
कुछ भूत में बनी
पोथीयों का बोझ लादे....

निर्भीक...
निःसंशय ...
जैसे...रवि/
पूरब से अंधकार को
धकेलता चला आ रहा हो...

मुश्कुरता...
खिलखिलाता....

जैसे ......प्रकृति

लिख रही है /नए जीवन /नए मंच
/नयी आकृति
सुबह की /ताजी हवा /नया सा स्वाद ले के...


June 25 at 6:37am मौलिक अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:06am — No Comments

पसीने का एक बूंद(श्रमिक संघर्ष)

पसीने काबूंद

माथे से उपज

ठिठकता /चलता या बहता

निचे की ओर

रुख और अधरों

का सरोकार करते हुए

चुमते/बिदा लेते/रु-बरु

आ पहुचा ...

ह्रदय के पास

मन में अंगड़ाई ले

कहने लगा

मुझे कबूल कर ले

बस यहीं ठहर जाउंगा.....

मृदा को मर्दित करता

श्रमिक (किसान)

धराशाई करता है

थकावट /

और पसीने की बूंद की अर्जी

लगा रहता है

कर्म और मेहनत

का बिस्वास ले

तपती/

सूखी /बंजर /

जमीं को

सींचता है

पूरा… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:02am — No Comments

कमी रह गयी...

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
प्यार की सब किताबे धरी रह गई

रोज मिलते रहे दर्दों गम हर गली
जिंदगी बस कड़ी की कड़ी रह गई

खामोश आँगन मेरा सुगबुगाता रहा
आँखों में बारिश की झड़ी रह गई

खुशियाँ रूठी तो बाहर निकली इस कदर
दरवाजे की कड़ी लगी रह गई

कलम उछली खुद को नचनियां समझ
प्रे म पत्रों की तबियत बिगड़ी रह गई

जस्न मनाये तो बिंदोरी मनाये किस तरह
रोशनी बस घडी दो घडी रह गई

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:50pm — No Comments

.ये हवा भी किस तरफ

ये हवा भी किस तरफ चलने लगी है
हर तरफ बस मौत ही जड़ने लगी है
----
----
आज सरकारी गवाहों को मसल के
राजनीति आँगन पे हगने लगी है
----
-----
मुंडवा के जो निकल आई समझने
राजनीति चाय पे मरने लगी है
------
अप्रकाशित-----आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:48pm — No Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"    राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
6 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है…"
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सादर अभिवादन।"
19 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"स्वागतम"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  प्रस्तुत नवगीत को आपसे मिला उत्साहवर्द्धन हमें प्रयासरत रखेगा, आदरणीय अशोक…"
23 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"  आदरणीय रवि भसीन ’शाहिद’ जी, प्रस्तुति पर आपका स्वागत है। इस गजल को आपका अनुमोदन…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। इस प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। हर शेर में सार्थक विचार…"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार…"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार…"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक कुमार जी, नमस्कार। इस सुंदर ग़ज़ल पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। /रास्तों …"
Monday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल…See More
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service