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Saurabh Pandey's Blog – June 2011 Archive (4)

चीख सिलवटों की

निस्शब्द स्वरों के कानफोड़ू शोर

चिलचिलाते मौन की बेधती टीस

लगातार भींचती जाती दंत-पंक्तियों में घिर्री कसावट

माज़ी का गाहेबगाहे हल्लाबोल करते रहना..... ....

जब एकदम से सामान्य हो कर रह जाय.. 

तो फिर...

कागज़ के कँवारेपन को दाग़ न लगे भी तो कैसे?

आखिर जरिया भर है न बेचारा ..

/एक माध्यम भर../

कुछ अव्यक्त के निसार हो जाने भर का

महज़ एक जरिया ... ...और....

किसी जरिये की औकात आखिर होती ही क्या है ?

उसके…

Continue

Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 8:09pm — 11 Comments

स्मृतियों के दरीचे से

स्मृतियों के अनगढ़ कमरे से

अचानक बाहर फुदक आयी हैं कुछ नम रोशनियाँ... /आज फिर.. ..

एक बार फिर

मासूम सी कोशिश की है इनने..

कि, मनाँगन में

कशिशभरी आवारा धूप बन लहर-लहर नाचेंगी..

 

तुम मेरे साथ हो न हो.... ..

इन रोशनियों के साथ जरूर होना.. ..

...............कोशिश तो करना.. ..

मुझे पता है .. गया समय उल्टे पाँव नहीं चलता..

किन्तु इन भोली-निर्दोष रोशनियों को अब कौन समझाये..

और देखो.. ..

तुम भी मत समझाना..…

Continue

Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 7:30pm — 12 Comments

आओ साथी बात करें हम

आओ साथी बात करें हम

अहसासों की रंगोली से रिश्तों में जज़्बात भरें हम..

 

रिश्तों की क्यों हो परिभाषा

रिश्तों के उन्वान बने क्यों

हम मतवाला जीवनवाले

सम्बन्धों के नाम चुने क्यों

तुम हो, मैं हूँ, मिलजुल हम हैं, इतने से बारात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

 

शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती--

--की चीखों से क्या घबराना

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन…

Continue

Added by Saurabh Pandey on June 22, 2011 at 6:30pm — 18 Comments

हम ठगे जाते रहे हैं..

हम लुटे हैं

हम ठगे हैं.. और ये होता रहा है पुरातन-काल से..

हम ठगाते ही रहे हैं..

उन हाथों ठगे जिन्हें

प्रकृति-मनुज का क्रमान्तर बताना था

काल-मनवन्तर रचना और बनाना था

वर्ग-व्यवहार निभाना था..

हम ठगे गये उन आत्म-अन्वेषियों/खोजियों के हाथों

छोड़ गये जो पीछे बिलखता समुदाय, पूरा समाज

परन्तु यह वर्त्त न पा सका एक मुसलसल रिवाज़

फिर, हम फिर ठगे गये उनसे

जिन्होंने अपनी रीढ़हीन मूँछों और अपनी अश्लील ज़िद के आगे

पूरे राष्ट्र को रौंदवा दिया.. और धरवा… Continue

Added by Saurabh Pandey on June 6, 2011 at 1:20am — 6 Comments

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