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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – May 2016 Archive (5)

पूछता है आइना-ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

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खो गया है अक्स असली ढूँढता है आईना।

होंठ पर मुस्कान नकली देखता है आईना।।

.

इक कहानी है लिखी जो रूप के इस पृष्ठ पर।

किसका हस्ताक्षर जटिल है पूछता है आईना।।

.

हाथ की सारी लकीरें जल गयीं तन्दूर में।

क्या पढ़ें किस्मत का लेखा सोचता है आईना।।

.

बालपन से ढ़ो रहा वो ईंट सर पर पूज्यवर।

भूख से संघर्ष का कल बाँचता है आईना।।

.

मर रहा था अस्थि का ढाँचा जिलानें के लिये।

बिक गयी माता…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 30, 2016 at 11:30pm — 8 Comments

कोई छेड़े न ग़र बेहतर- ग़ज़ल

बहुत बेचैन हूँ इस पल

कोई छेड़े न गर, बेहतर।

उठा भूकम्प है मन में

सभाले तो कोई ये घर।।



चली है आरी-ए-मतलब

नहीं बाक़ी शज़र कोई।

हुआ पूरा शहर नंगा

ये दिल तो हो गया बंज़र।।



कहाँ तुमको खिलाऊँगा

न वो पनघट न पानी है।।

लहर नफ़रत की बहती है,

बहुत ही ख़ार है अंदर।।



अभी तो नींद टूटी है

अभी दुनिया से मिलना है।

मिलाकर आँख कहना है

ज़रा दिखलाओ अपने "पर"।।



डरायेगा कोई मुझको

अतल गहराइयों से क्या?

बताया जाये… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 12, 2016 at 9:53am — 6 Comments

सावन की तैयारी है-ग़ज़ल

22-22-22-22-----22-22-22-2



प्रीत रीत हम निभा न पाये, खूब हुई गद्दारी है।

ग़म का ताप चढ़ा है मन पर, सावन की तैयारी है।।



इस गुलशन में स्वप्न पुष्प के, बाग़ लगाना अपनी ख़ता।

खारे जल से इसका सिंचन, करना तो लाचारी है।।



चिटख गया है शीशा-ए-दिल,चुभता है, हर धड़कन पर।

साँसें थामे रखना मुश्किल, जीना इक दुश्वारी है।।



उसे बेवफ़ा बोलूँ महफ़िल, में ये कैसे है सम्भव।

जिसे पूजता रहा उसे बदनाम करूँ, मक्कारी है।।



जब भी हाथ दुआ में उट्ठें, सिर्फ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:30pm — 3 Comments

तलाशी ले रहा है आइना, पर मैं लजाता हूँ- ग़ज़ल(इस्लाह के लिए)---संशोधित

1222 1222 1222 1222

तलाशी ले रहा है आईना, पर मैं लजाता हूँ।

लगे हैं दाग जो अंदर, मेरे उनको छिपाता हूँ।।



चढ़ा कर रंग रोगन का, कवर मैं खुद के चेहरे पर।

हूँ मैं भी खूबरू बस, ऐसा दुनिया को दिखाता हूँ।।



मग़र मालूम है मुझको, हक़ीक़त क्या है अन्तस की।

महज़ मैं मोह औ मद के लिए, महफ़िल सजाता हूँ

।।



यही सच है छिपाना व्यर्थ है सब जानता है "मन"

की मैं दौलत की ख़ातिर ही, तो बस जीवन गँवाता हूँ।।



इसे सुंदर बनाने को, हाँ अंदर घर सजाने… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:00am — 4 Comments

यदि ये बर्फ़ पिघलती है-ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 22 2



राजनीति से जिन लोगों की, रोज़ी रोटी चलती है।

सच का करें विरोध अगर वो, तो उनकी क्या गलती है।।

किन्तु लेखनी वाले लोगों, से मेरा बस प्रश्न यही।

उनकी नैतिकता क्यों झूठे रंगों में हाँ ढ़लती है।।

वर्ग विभाजन लोकतंत्र में तो बस सत्ता की कुंजी।

किन्तु नीति यह सृजन क्षेत्र में आख़िर काहें मिलती है।।

यद्यपि आज़ादी से लेकर तुझसे नेता कई लड़े।

फिर भी अरे गरीबी तेरी चूल न काहें हिलती है।।

सोचो नफ़रत…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 4, 2016 at 11:51pm — 9 Comments

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