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Rajesh kumari's Blog – April 2016 Archive (4)

रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के (ग़ज़ल राज )

२२  २२   २२   २२   २२  २

 

हँसते दर्पण जब जब तेरी आँखों के

रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के

 

धीमे धीमे होती है ये  रात जवाँ

ख़्वाब मचलते हैं प्यासे पैमानों के

 

कैसे डूबे  भँवरों में  किश्ती नादां

सिखलाते हमको गड्ढे रुखसारों के

 

गोया नभ से चाँद उतर आया कोई        

चेह्रे से  हटते ही साए  बालों के

 

पार उतर आये हम  तूफां से बचकर

मस्त सफीने पाए  तेरी  बाहों  के 

 

खूब शफ़ा…

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Added by rajesh kumari on April 25, 2016 at 8:00pm — 19 Comments

मौत ही रास्ता नहीं होता (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ १२१२ २२

हुस्न गर  बावफ़ा नहीं होता,

दिल कभी आशना नहीं होता

 

खेलना दिल से तोड़ देना फिर

ये कोई  कायदा नहीं होता

 

दिल्लगी से हुए तमाशे का

हर कहीं तज़करा नहीं होता

 

जान पाता कभी नहीं उसको

,मैं अगर आइना नहीं होता 

 

मार देती ये तिश्नगी मुझको,

काश ये मयकदा नहीं होता

 

मुश्किलों से निजात पाने को,

मौत ही रास्ता नहीं होता

 

छेड़ता वो न बारबार इसको,

जख्म मेरा…

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Added by rajesh kumari on April 21, 2016 at 11:18am — 8 Comments

बाँध

उसके गले में गोया सहस्त्रों  केक्टस उग आये हों 

थोड़ी थोड़ी देर में उनको निगलने की कोशिश में

गले की कोशिकाएँ कभी खिंच रही थी

 कभी  फूल रही थी

साँसें नियंत्रण खो रही थी

आँखों में दर्द के लाल डोरे उभर आये थे

मुझे ऐसा लगा मैं बहते दरिया को  बाँध से रोकते हुए  देख रही हूँ

जो कितना तकलीफ देह है

कुछ देर  और देखती रहूंगी तो वो मेरी आँखों

के रास्ते बह चलेगा

क्यूँ नहीं उस दरिया को मुक्त किया जा रहा

भावनाओं पर नियंत्रण…

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Added by rajesh kumari on April 11, 2016 at 10:24am — 2 Comments

दिलों को लूटती मेरी ग़ज़ल (राज)

१२२२ १२२२ १२

जदल से ऊबती मेरी ग़ज़ल

मुहब्बत ढूँढती मेरी ग़ज़ल

 

कहाँ वो प्यार उल्फ़त का जहाँ 

कलम से पूछती मेरी ग़ज़ल

 

कदूरत के समंदर चार सू

किनारा ढूँढती मेरी ग़ज़ल

 

न खिड़की है न रोशनदान है

जिया बिन सूखती मेरी ग़ज़ल

 

सुलगते तल्खियों के अर्श पे

सितारे  गूँथती मेरी ग़ज़ल

 

लिखे हर बार लफड़े रोज के

कसम से टूटती मेरी ग़ज़ल

 

अमन का रंग गर मिलता यहाँ

दिलों को लूटती मेरी…

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Added by rajesh kumari on April 4, 2016 at 9:16am — 26 Comments

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