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May 2019 Blog Posts


सदस्य टीम प्रबंधन
अभी अभी बस

अभी-अभी 

उतरी आँगन में 

धूप गुनगुनी, 

अभी-अभी 

खोले हैं 

सपनों की तितली ने पर,

अभी-अभी 

खुद सोनपरी नें 

रची रंगोली,

अभी-अभी 

बस ओस 

गुलाबी पंखुड़ियों पर 

आ ठहरी है, 

अभी-अभी 

फूटा है अंकुर 

हरसिंगार का,

अभी-अभी 

सीपी में दमका है इक मोती,

अभी-अभी नन्हे चूजे नें 

पकड़ कवच 

झाँका है अम्बर,

अभी-अभी 

एक नम सी बदली 

संग हवा के बह आई…
Continue

Added by Dr.Prachi Singh on May 2, 2019 at 10:00am — 6 Comments

हस्ताक्षर....एक क्षणिका....

हस्ताक्षर....एक क्षणिका....

स्वरित हो गए
नयन
अंतर्वेदना की वीचियों से
वाचाल हुए
कपोल पर
मूक प्रेम के
खारे
हस्ताक्षर

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशसित

Added by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 8:11pm — 4 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में मेरी तृतीय रचना

खड़ा आपके सामने हाथ जोड़े, लिए स्नेह आशीष की कामना को
करूँ शिल्पकारी सदा छंद की मैं, न छोड़ूँ नवाचार की साधना को
लिखूँ फूल को भी लिखूँ शूल को भी, लिखूँ पूर्ण निष्पक्ष हो भावना को
कभी भूल से भी नहीं राह भूलूँ, लिखूँ मैं सदा राष्ट्र की वेदना को

शिल्प -यगण ×8

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by नाथ सोनांचली on May 1, 2019 at 6:38pm — 6 Comments

कस्तूरी यहाँँ, वहाँँ, कहाँ (लघुकथा)

स्थानीय पार्क में शाम की चहल-पहल। सभी उम्र के सभी वर्गो के लोग अपनी-अपनी रुचि और सामर्थ्य की गतिविधियों में संलग्न। मंदिर वाले पीपल के पेड़ के नीचे के चबूतरे पर अशासकीय शिक्षकों का वार्तालाप :

"हम टीचर्ज़ तो कोल्हू के बैल हैं! मज़दूर हैं! यहां आकर थोड़ा सा चैन मिल जाता है, बस!" उनमें से एक ने कहा।

"महीने में हमसे ज़्यादा तो ये अनपढ़ मज़दूर कमा लेते हैं! अपन तो इनसे भी गये गुजरे हैं!" दूसरे ने मंदिर के पास पोटली खोलकर भोजन करते कुछ श्रमिकों को देख कर कहा।

उन दोनों को कोल्ड-ड्रिंक्स…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 1, 2019 at 5:32pm — 3 Comments

ये दिल.....

ये दिल..... 

फिर

धोखा दे गया

धड़क कर

ये दिल

वादा किया था

ख़ुद से

टुकड़े

ख़्वाबों के

न बीनूँगा मैं

सबा ने दी दस्तक

लम्स

यादों के

जिस्म से

सरगोशियाँ करने लगे

भूल गया

खुद से किया वादा

बेख़ुदी में

खा गया धोखा

किसी की करीबी का

भूल गया हर कसम दिल

डूब गया

सफ़ीना यादों का

बेवफ़ा

हो गया साहिल



लाख

पलकें बंद कीं

बुझा दिए चराग़

तारीकियों में…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 3:53pm — 8 Comments

कुण्डलिया छंद-. [अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में]

खेती में घाटा हुआ, कृषक हुए मजबूर।

क्षुधा मिटाने के लिए, बने आज मजदूर।।

बने आज मजदूर, हुए खाने के लाले।

चले गाँव को छोड़, घरों में डाले ताले।।

खाली है चौपाल, गाँव में है सन्नाटा।

फाँसी चढ़े किसान, हुआ खेती में घाटा।।

2-

बिकने को बाजार में, खड़ा आज मजदूर।

फिर भी देश महान है, उनको यही गुरूर।।

उनको यही गुरूर,नहीं अब रही गरीबी।

वह खुद हुए धनाड्य,साथ में सभी करीबी।।

नेता शासक वर्ग, सभी लगते घट चिकने।

लेते आँखें मूँद, खड़ा है मानव…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 1, 2019 at 3:11pm — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४

जनाब अहमद फराज़ साहब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल



221 1221 1221 122



बुझते हुए दीये को जलाने के लिए आ

आ फिर से मेरी नींद चुराने के लिए आ //१



दो पल तुझे देखे बिना है ज़िंदगी मुश्किल

मैं ग़ैर हूँ इतना ही बताने के लिए आ //२



तेरे बिना मैं दौलते दिल का करूँ भी क्या

हाथों से इसे अपने लुटाने के लिए आ //३



तेरा ये करम है जो तू आता…

Continue

Added by राज़ नवादवी on May 1, 2019 at 12:00am — 9 Comments

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