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एक शाम --( कविता )

एक शाम

उदास सी थी

निस्तेज , निशब्द , निस्पंदित

निहारती सी

दूर तलक शून्य मे।  

कर्तव्य विहीन, कर्म विहीन

अचेतन जड़ हो गए जो

पुकारती सी

दूर तलक शून्य मे ।

नेपथ्य से कुछ सरसराहट

वैचारिक या मौन

विजयी पर प्रसन्न नहीं

श्रोता सी

दूर तलक शून्य मे ।

अन्तर्मन के क्रंदन को

छिपा मुख मण्डल पर खेलती जो

अलौकिक आभा थी

दूर तलक शून्य मे ............... ।  

 

 

अप्रकाशित…

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Added by annapurna bajpai on September 13, 2013 at 5:39pm — 26 Comments

आग की एक चिंगारी

आग की एक चिंगारी

सियासत के तूफानी थपेड़े झेल ,

फैली मीलो एक चिंगारी,

मिटाने को आतुर ,

निगल लेने को सबकुछ,

अंतर न अपने का ना पराये का ,

ना जातिवाद कोई ना ही कोई धरम ,

मुंह खोल आगे को बढ़ी आती ,

ना देखती दोष किसी का ,

न निर्दोष की चिंता ,

ना कोई लालच न कोई गम ,

चिरनिंद्रा में सुलाने को आतुर ,

एक छोटी सी चिंगारी ,

ये दोष है हम सबका ,

या नियति का लिखा ,

एक भूल है हम सबकी ,

जो इसके शिशु…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 13, 2013 at 4:30pm — 4 Comments

डर लगता है,

नींद कहीं फिर आ ना जाए , डर लगता है,

ख्वाब वही फिर आ ना जाए, डर लगता है ।

सावन सा वो बरस रहा है मन आँगन में ,

मौसम कहीं बदल ना जाए, डर लगता है…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on September 13, 2013 at 3:00pm — 21 Comments

मरा कौन ?

मरा कौन ?

कही पे हिन्दू मरता है ।

कही मुसलमान मरता है ।।  

चले जब तलवार नफरत की ।

तो बस इंसान मरता है ॥

 

कही पर घर जलता है ।  

कही मकान जलता है ॥  

मगर इन लपटो से मेरा ।

प्यारा हिन्दुस्तान जलता है ॥

 

न कुछ हासिल तुम्हे होगा ।

न कुछ मेरा भला होगा ।

दरख्तो पे जो बैठे है ।

बस गिद्धो का भला होगा ॥

 

कही मन्दिर पे है पाँबन्दी ।

कही मस्जिद पे पहरा है…

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Added by बसंत नेमा on September 13, 2013 at 12:00pm — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो .......(गज़ल) //डॉ० प्राची

१२२२...१२२२ 

नज़र दर पर झुका लूँ तो 

मुहब्बत आज़मा लूँ तो 

तेरी नज़रों में चाहत का 

समन्दर मैं भी पा लूँ तो 

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

अगर खतरा उठा लूँ तो 

सियह आरेख हाथों का 

तेरे रंग में छुपा लूँ तो 

तेरी गुम सी हर इक आहट 

जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो 

तुम्हारे संग जी लूँ मैं  

अगर कुछ पल चुरा लूँ तो 

न कर मद्धम सी भी हलचल 

मैं साँसों को…

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Added by Dr.Prachi Singh on September 13, 2013 at 9:30am — 55 Comments

ग़ज़ल - इल्म की रोशनी नहीं होती !

ग़ज़ल –

२१२२   १२१२   २२

इल्म की रोशनी नहीं होती ,

ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं होती |

 

एक कोना दिया है बच्चों ने ,

और कुछ बेबसी नहीं होती |

 

रंग आये कि सेवई आये ,

तनहा कोई ख़ुशी नहीं होती |

 

दिल के टूटे से शोर होता है ,

ख़ामुशी ख़ामुशी नहीं होती |

 

सारे चेहरे छुपे मुखौटों में ,

दिल में भी सादगी नहीं होती |

 

माँ के आँचल से दूर हैं बच्चे ,

बाप से बंदगी नहीं होती…

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Added by Abhinav Arun on September 13, 2013 at 5:30am — 44 Comments

बाज़ार

बाज़ार

संजीदे संगीन ख़यालों-ख़वाबों भरा बाज़ार

उसमें मेरी ज़िन्दगी, सब्ज़ी की टोकरी-सी।

कुछ सादी सच्चाईयाँ भरीं उस टोकरी में,

प्यार के कच्चे-मीठे-कड़वे झूठों का भार,

चाकलेट के लिए वह छोटे बचकाने झगड़े,

शैतानी भी, और बचपन के खेल-खिलवाड़।

भीड़ में भीड़ बनने की थी बेकार की कोशिश,

बनावटी रंगों की बेशुमार बनावटी सब्ज़ियाँ,

मफ़्रूज़ कागज़ के फूल यह असली-से लगते,

थक गया हूँ अब इनसे इस…

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Added by vijay nikore on September 13, 2013 at 1:30am — 16 Comments

आस सजायी

हमने घर की दीवारों में    

जीवन की इक आस सजायी

 

रत्ती-रत्ती सुबह बटोरी

टुकड़ा-टुकड़ा साँझ संजोई

इस चुभती तिमिर कौंध में

दीपों की बारात सजायी

 

तिनका-तिनका भाव बटोरे 

टूटे-फूटे सपन संजोये

साँसों की कठिन डगर पे

आशा ही दिन-रात सजायी  

 

भूख सहेजी, प्यास सहेजी 

सोती-जगती रात सहेजी 

यूँ चलते, गिरते-पड़ते 

कितनी टूटी बात सजायी

 

तेरे हाथों के स्पर्शों ने   

इन होठों…

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Added by बृजेश नीरज on September 12, 2013 at 11:00pm — 30 Comments

ग़ज़ल : बनना हो बादशाह तो दंगा कराइये

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

 

सत्ता की गर हो चाह तो दंगा कराइये

बनना हो बादशाह तो दंगा कराइये

 

करवा के कत्ल-ए-आम बुझा कर लहू से प्यास

रहना हो बेगुनाह तो दंगा कराइये

 

कितना चलेगा धर्म का मुद्दा चुनाव में

पानी हो इसकी थाह तो दंगा कराइये

 

चलते हैं सर झुका के जो उनकी जरा भी गर

उठने लगे निगाह तो दंगा कराइये

 

प्रियदर्शिनी करें तो उन्हें राजपाट दें

रधिया करे निकाह तो दंगा…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 12, 2013 at 10:57pm — 33 Comments

मेरी नजर से हाइकु ...

भाव दिल के
क्रमबद्ध सजाये
बनी कविता !!

तुकान्त लय
समान मात्रा गणना
बने मुुक्तक !!

तीन पंक्तियां
पंच सप्तम पंच
हाइकु शैली !!

विस्तृत भाव
भूमिकाबद्ध व्याख्या
बने कहानी !!

कम शब्दों में
दे सार्थक सन्देश
लघु कहानी !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

प्रवीन मलिक ...

Added by Parveen Malik on September 12, 2013 at 9:30pm — 13 Comments

मौन

मौन !

ये कैसा मौन ?

अन्तर्मन में ,

कुछ टूटता सा ,

सुनाई देती जिसकी गूंज देर तक !

हर घटना पर छोड़ जाता कई यक्ष प्रशन !

आँखों में ये कैसा मौन ?

लबो पे ये कैसा मौन ?

दिल में बरछी की तरह गड़ता ,

तीर की तरह चुभता ये मौन ,

ये गवाह है एक बड़े विनाश का !

और जवाब है खुद ही अबूझ सवालों का ,

दिल की हर भावना से जुड़ा ,

मन के किसी कोने में पला ,

पल पल गहराता जाता,

ये कैसा अबूझ मौन ?

जो पहेली बन…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 12, 2013 at 4:30pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बेमेल बंधन ..................डॉ० प्राची

अविश्वास !

प्रश्नचिन्ह !

उपेक्षा ! तिरस्कार !

के अनथक सिलसिले में घुटता..

बारूद भरी बन्दूक की

दिल दहलाती दहशत में साँसे गिनता..

पारा फाँकने की कसमसाहट में

ज़िंदगी से रिहाई की भीख माँगता..

निशदिन जलता..

अग्निपरीक्षा में,

पर अभिशप्त अगन ! कभी न निखार सकी कुंदन !

इसमें झुलस

बची है केवल राख !

....स्वर्णिम अस्तित्व की राख !

और राख की नीँव पर

कतरा-कतरा ढहता  

राख के घरौंदे…

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Added by Dr.Prachi Singh on September 12, 2013 at 4:00pm — 25 Comments

परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी-

टकी टकटकी थी लगी, जन्म *बेटकी होय |

अटकी-भटकी साँस से, रह रह कर वह रोय |


रह रह कर वह रोय, निहारे अम्मा दादी |
मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी |


परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी |
किस्मत से बच जाय, कंस तो निश्चय पटकी ||

.
*बेटी

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 12, 2013 at 2:00pm — 5 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

(1)

कन्या होती भाग्य से,रखना इसका मान

कन्या घर में आ रही, ले गौरी  वरदान |

ले गौरी वरदान,  आँगन कुटी मह्कावे,

घर आँगन चमकाय,कुसुम कलियाँ खिलजावे

शिक्षा का हो भान, बनावे शिक्षित सुकन्या

रखती मन में धैर्य,कष्ट सहती है कन्या

.

(2)

जन्मे बेटी भाग्य से, घर को दे मुस्कान

पालन -पौषन  साथ ही, पावे  शिक्षा ज्ञान |

पावे  शिक्षा ज्ञान, समाज बने संस्कारी   

नारी का हो मान, करे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2013 at 11:30am — 15 Comments

कि तुझसे हो के, हर एक शेर हर ग़ज़ल गुज़रे...

कुछ इस तरह से, मेरी ज़िन्दगी का पल गुज़रे ।

ह्रदय की पीर, मेरे आंसुओं में ढल गुज़रे ।।

तुझे मै देख के लिक्खूं , या सोच के लिक्खूं ।

कि तुझसे हो के, हर एक शेर हर ग़ज़ल गुज़रे ।।

यूँ तो एक रोज़ गुज़ारना है दिल की धड़कन को ।

पर तुझे देख के धडके, धड़क के दिल गुज़रे ।।

वो तेरा दर की जहाँ हम बिछड़ गए थे कभी ।

हो के हर रोज़ उसी दर से, ये पागल गुज़रे ।।

वो एक दिन की वीर खुशियों का सिकंदर था ।

ये एक दिन, की तेरे गम…

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Added by Anil Chauhan '' Veer" on September 12, 2013 at 11:00am — 6 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बदलियों से चाँदनी का झिलमिलाना शेष है।

घन तिमिर में दीपकों का बुदबुदाना शेष है॥

सावनों की खो चुकी झड़ियाँ कहीं मिल जाएँगी,

देवदारों की कतारों का सजाना शेष है।

फिर घृणा उन्मादिनी सी दौड़ती है प्राण में,

प्रीत के आखर अढ़ाई कसमसाना शेष है।

हलचलों में खो चली है रात की नि:शब्दता,

भोर की पहली किरण का खिलखिलाना शेष है।

रूढ़ियों के बाँध सारे तोड़ कर कविता बहे,

पीर की प्राचीर में यूँ छटपटाना शेष है।

फिर परिन्दों ने बदल दी आज उड़ने की अदा,

हाय! लेकिन… Continue

Added by Ravi Prakash on September 12, 2013 at 8:30am — 21 Comments

कुंड़ली

काम कैसे कठिन भला, हो करने की चाह ।
मंजिल छुना दूर कहां, चल पड़े उसी राह ।।
चल पड़े उसी राह, गहन कंटक पथ जावे ।
करे कौन परवाह, मनवा जो अब न माने ।।
जीवन में कुछ न कुछ कर, जो करना हो नाम ।
कहत ‘रमेश‘ साथी सुन, जग में पहले काम ।।

......................................
मौलिक अप्रकाशित (प्रथम प्रयास)

Added by रमेश कुमार चौहान on September 11, 2013 at 11:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
थक के हारा, कभी मरा भी है (ग़ज़ल)

2122 1212  22

कुछ बहा पर बचा ज़रा भी है

जख़्म लेकिन, कही हरा भी है

जिनको बांटा उन्हें मिला भी पर

प्यार से दिल मेरा भरा भी है

ख़्वाब ताबीर तक कहाँ पहुंचा

थक के हारा,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 11, 2013 at 10:00pm — 35 Comments

यादें

यादें

भूली बिसरी यादें ,

कुछ मिट गयी कुछ है अमिट,

एक पल मिल जाये तो संजो लूँ इन्हें ,

कुछ खुबसूरत

कुछ दर्द छेडती,

लबो पे मुस्कान सजाती यादें ,

जख्मो को उघाडती यादें ,

मन के किसी कोने में बसी यादें ,

जिंदगी का इम्तिहान बनी यादें ,

एक पल मिल जाए तो संजो लूँ इन्हें ,

कुछ में उभरता उसका अक्स ,

कुछ कोहरे सी छाई होशोहवास पे ,

खुद में खुशियाँ अपार लिए ,

कुछ गमो का एक संसार लिए ,

धुंधली सी…

Continue

Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 11, 2013 at 8:08pm — 5 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-६८ (तरुणावस्था-१५): रेल से आंध्रा का सफ़र

(आज से करीब ३१ साल पहले)

किसी उदास दिन, किसी खामोश शाम, और किसी नीरव रात सा ये सफ़र मुझे बेचैन कर गया. रेल सरपट भागी जा रही थी और नज़ारे, खेत और खलिहान पीछे. दोपहर की वीरानगी में स्त्री-पुरुषों के साथ बच्चों को खेतों पे काम करते देख मन अजीब पीड़ा से भरता जा रहा था. गाड़ी भागती जा रही थी मगर बंजर दिखते खेत और पठारी एवं असमतल भूमि का कहीं अंत नहीं दिख रहा था. बैल हल का जुआ कंधे पे थामे, किसान अरउआ हाथ में पकड़े, औरतें और बालाएं हाथ में हंसिया लिए झुकी कमर, खामोशी, और निस्तब्धता…

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Added by राज़ नवादवी on September 11, 2013 at 4:51pm — 6 Comments

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