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हाले बेबसी ....

शबनम नहीं बरसते आसमां से आग अब तो

जज़्बों से ब्यां हो दिल के दा़ग अब तो



इतने शौले उमड़ पड़े नाउम्मीदी के आतिश का

जलता नहीं दिल में उम्मीदों के चि़राग अब तो



सोचूँ तो दर्द बोलूँ तो दर्द हरसू दर्द दिखाई दे

काटों की तरह चुभने लगा गुलाब अब तो



जिऩ्दगी से नफरत होने लगी कज़ा से उल्फत

टूटे हुऐ दिल में सजता नहीं है ख़्वाव अब तो



जीने की तमन्ना में हम क्या क्या करते गये

हर सांस मागें जिऩ्दगी का हिसाब अब तो



क्या सोंचा जिन्दगी से… Continue

Added by Subodh kumar on September 22, 2010 at 5:00pm — 5 Comments

जिन्दगी समझौता ही सही

जिन्दगी समझौता ही सही

पर मुझे उससे प्यार है।

स्नेह, प्रेम, मर्यादा की

लहराती बयार है।

गम नहीं गर पूरी नहीं

होती, मेरी पुकार है।



जिन्दगी समझौता ही सही

पर मुझे उससे प्यार है।



उठते ही रसोई से समझौता,

यही तो जीवन की खुषियों का द्वार है।

बिजली, पानी, सफाई से समझौता

नियमित ही होते इनसे दो चार हैं।

जिन्दगी समझौता ही सही

पर मुझे उससे प्यार है।



कार्यालय पहुँचते ही काम से समझौता,

इसमें जीविका के संचालन का सार… Continue

Added by Jaya Sharma on September 22, 2010 at 2:04pm — 4 Comments


प्रधान संपादक
जनाब हिलाल अहमद "हिलाल" के 5 कत'आत

//अर्ज़-ए-हाल//

हम अपनी जान किसी पर निसार कैसे करें,

तुझे भुला के किसी और से प्यार कैसे करें ,

तेरे बिछड़ने से दुनिया उजड़ गई दिल की,

इस उजड़े दिल को अब हम खुशगवार कैसे करें !



//सुराग़//

शब् भर हमारी याद में ऐसे जगे हो तुम,

आराम तर्क करके टहलते रहे हो तुम,

बिस्तर की सिलवटों से महसूस हो गया,

कुछ देर पहले उठ के यहाँ से गए ही तुम !



//माँ//

मेहनत के बावजूद जो पंहुचा मै अपने घर ,

वालिद का ये सवाल कमाया है तुने कुछ .

बीवी को… Continue

Added by योगराज प्रभाकर on September 22, 2010 at 12:30pm — 1 Comment


प्रधान संपादक
जनाब हिलाल अहमद "हिलाल" के 7 कत'आत

//मशविरा//

हरगिज़ ना करना चाहिए इन्सान को गुरूर

दनिश्वरी के जौम में हो जाते हैं कुसूर

मैंने तमाम उम्र किया है सफ़र मगर

अब तक ज़मीं पे चलने का आया नहीं श'ऊर



//वाबस्तगी//

निगाह मिलते ही तुझको सलाम करता हूँ

तेरी नज़र का बड़ा एहतराम करता हूँ ,

मेरी ज़ुबां तेरी गुफ्तार से है वाबस्ता,

ये कौन कहता है सबसे कलाम करता हूँ !



//बदकिस्मती//

वो है मेरा रफीक मैं उसका रकीब हूँ

दुनिया समझ रही मैं उसके करीब हूँ

चाहा था जिसने मुझको मैं उसका… Continue

Added by योगराज प्रभाकर on September 22, 2010 at 12:29pm — 2 Comments

सफ़ेद कबूतर

कैसी तरखा हो गयी है गंगा ! यूँ पूरी गरमी में तरसते रह जाते हैं , पतली धार बनकर मुँह चिढ़ाती है ; ठेंगा दिखाती है और पता नहीं कितने उपालंभ ले-देकर किनारे से चुपचाप निकल जाती है ! गंगा है ; शिव लाख बांधें जटाओं में -मौज और रवानी रूकती है भला ? प्राबी गंगा के उन्मुक्त प्रवाह को देख रही है. प्रांतर से कुररी के चीखने की आवाज़ सुनाई देती है. उसका ध्यान टूटता है. बड़ी-बड़ी हिरणी- आँखों से उस दिशा को देखती है जहां से टिटहरी का डीडीटीट- टिट स्वर मुखर हो रहा था… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 22, 2010 at 10:07am — 11 Comments

समीक्षात्मक आलेख : डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य

समीक्षात्मक आलेख:



डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य







रचनाकार:आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'



जगवाणी हिंदी को माँ वीणापाणी के सितार के तारों से झंकृत विविध रागों से उद्भूत सांस्कृत छांदस विरासत से समृद्ध होने का अनूठा सौभाग्य मिला है. संस्कृत साहित्य की सरस विरासत को हिंदी ने न केवल आत्मसात किया अपितु पल्लवित-पुष्पित भी किया. हिंदी सहित्योद्यान के गीत-वृक्ष पर झूमते-झूलते सुन्दर-सुरभिमय अगणित पुष्पों में अपनी पृथक पहचान और ख्याति से संपन्न डॉ.… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 22, 2010 at 9:30am — No Comments

त्रिपदिक कविता : प्रात की बात -----संजीव 'सलिल'

त्रिपदिक कविता :



प्रात की बात



संजीव 'सलिल'

*

सूर्य रश्मियाँ

अलस सवेरे आ

नर्तित हुईं.

*

शयन कक्ष

आलोकित कर वे

कहतीं- 'जागो'.

*

कुसुम कली

लाई है परिमल

तुम क्यों सोये?

*

हूँ अवाक मैं

सृष्टि नई लगती

अब मुझको.

*

ताक-झाँक से

कुछ आह्ट हुई,

चाय आ गयी.

*

चुस्की लेकर

ख़बर चटपटी

पढ़ूँ, कहाँ-क्या?

*

अघट घटा

या अनहोनी हुई?

बासी… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 22, 2010 at 8:00am — 2 Comments

::::: मेरे जिस्म में प्रेतों का डेरा है ::::: ©



::::: मेरे जिस्म में प्रेतों का डेरा है ::::: © (मेरी नयी सवालिया व्यंग्य कविता)



मेरे जिस्म में प्रेतों का डेरा है...

नाना प्रकार के प्रेत...

भरमाते हुए...

विकराल शक्लें...

लोभ-काम-क्रोध-मद-मोह...

नाम हैं उनके...

प्रचंड हो जाता जब कोई...

घट जाता नया काण्ड कोई...

सृष्टि के दारुण दुःख समस्त...

सब दिये इन्हीं पञ्च-तत्व-भूतों ने...



लालसा...

अधिक से भी अधिक पाने की...

नहीं… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 22, 2010 at 4:30am — 5 Comments

"भईया"





नम आँखें...

आँखों में इंतज़ार...

कभी घड़ी को तकती...

तो कभी दरवाज़े की चौखट को...

और कभी थाली में सजी रेशम की डोर को...

उसमें सजे मोतियों की चमक में दिखता तेरा मुस्कुराता चेहरा...

और खो जाती मैं उस सुन्हेरे बचपन में...

जहाँ हर पल तेरा मुझे छेड़ना...

मुझे चिढ़ाना और चोटी खींचना...

तब भी आंसू देता था और आज भी...



तेरा शैतानियाँ करना और मेरा उन्हें माँ से छुपाना...

मुझे कोई रुलाये…
Continue

Added by Julie on September 22, 2010 at 2:44am — 5 Comments

ग़ज़ल- पल्लव पंचोली "मासूम"

फिर उसकी महक ले हवाएँ आईं
शायद काम मेरे मेरी दुआएँ आईं

आँखों में फिर थोड़ी चमक है सबकी
जाने क्या संग अपने ले घटाएँ आई

कौन बचा है खुदा के इंसाफ़ से यहाँ
सब के हिस्से मे अपनी सजाएँ आईं

बीमार कहाँ मरते हैं मरज से यहाँ
काम मारने के अब तो दवाएँ आईं

जब लगा ख़तरे मे है कोई "मासूम"
दौड़ चली शहर की सब माएँ आईं ,

Added by Pallav Pancholi on September 21, 2010 at 10:00pm — 2 Comments

कुछ इस कदर वो मुझे चाहती हैं .....???????????

ख़्यालों के तासीर से दिल अपना बहला लेते हैं

कुछ लोग एहसासे बुलंदी से हीं आसूदगी पा लेते हैं


आसूदगी = संतोष



**********************************************************************



फितरते दिलकशी है चेहरे पर नक़ाब उनका

राजे दिल फा़श करे रंगे शबाब उनका



वो न कहें लबों से चाहे कुछ मगर

कहती है बहुत कुछ अंदाजे हिजा़ब उनका



हैं वो भी मुज़्तरिब जितना की दिल मेरा

ये और बात है कहे न कुछ इजि़्तराब उनका

मुज़्तरिब = व्याकुल… Continue

Added by Subodh kumar on September 21, 2010 at 5:30pm — 2 Comments

आज की साम्प्रदायिकता के नाम...........

काश रहबर मिला नहीं होता

मै सफ़र में लुटा नहीं होता



गुंडागर्दी फरेब मक्कारी

इस ज़माने में क्या नहीं होता



हम तो कब के बिखर गए होते

जो तेरा आसरा नहीं होता



आग नफरत की जिसमे लग जाये

पेढ़ फिर वो हरा नहीं होता



हम शराबी अगर नहीं बनते

एक भी मैकदा नहीं होता



हिन्दू मुस्लिम में फूट मत डालो

भाई भाई जुदा नहीं होता



ये सियासत की चाल है लोगो

धर्म कोई बुरा नहीं होता



मंदिरों मस्जिदों पे लढ़ते… Continue

Added by Hilal Badayuni on September 21, 2010 at 12:56pm — 3 Comments

उम्रे तमाम

उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया

इस जीवन से तूने क्या लिया |

इस जीवन को तूने क्या दिया

उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |

ता उम्र तू रहा इस कदर बेखबर

रही न तुझे अपनी जमीर की खबर |

करता रहा तू मनमानी अपनी

रही न तुझे वक्त की खबर

उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |

करता रहा तू मेरा - मेरा

नही है , यहा कुछ तेरा - मेरा |

उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया

मनुष्य जन्म तुझे है , किसलिए मिला

इस जन्म को किया क्या सार्थक तूने |

उम्रे तमाम गुजारी… Continue

Added by Pooja Singh on September 21, 2010 at 9:35am — 2 Comments

कर कुछ नया रे मनवा ,

कर कुछ नया रे मनवा ,

जा मति जा मति जा ,

छोड़ के सभको यु ही अकेले ,

उसपे दुनिया के लाख झमेले ,

द्वन्द को और ना बढ़ा ,

कर कुछ नया रे मनवा ,

जा मति जा मति जा ,

जब आया तू था सब सुन्दर ,

फिर माया मोह में लपटाया ,

जीवन को तू जीना चाहा ,

खुद को इसमें फसाया ,

अब क्यों कर तू सोचे हैं ,

फस गया मैं ये कहा ,

कर कुछ नया रे मनवा ,

जा मति जा मति जा ,

कर कुछ यैसा रह के जहाँ में ,

और ये सब को बता ,

नही हैं तेरे वास्ते कुछ भी… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on September 20, 2010 at 5:43pm — No Comments

बाहर बहुत बर्फ है

तुम्हारे देश के उम्र की है

अपने चेहरे की सलवटों को तह करके

इत्मीनान से बैठी है

पश्मीना बालों में उलझी

समय की गर्मी

तभी सूरज गोलियां दागता है

और पहाड़ आतंक बन जाते हैं

तुम्हारी नींद बारूद पर सुलग रही है

पर तुम घर में

कितनी मासूमियत से ढूंढ़ रही हो

कांगड़ी और कुछ कोयले जीवन के

तुम्हारी आँखों की सुइयां

बुन रही हैं रेशमी शालू

कसीदे

फुलकारियाँ

दरियां ..

और तुम्हारी रोयें वाली भेड़

अभी-अभी देख आई है

कि चीड और… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 20, 2010 at 4:00pm — 13 Comments

मुहब्बत : करके भी न कर सके !

खु़दा मेरी दीवानगी का राज फा़श हो जाये

वो हैं मेरी ज़िन्दगी उन्हें एहसास हो जाये



सांसे उधर चलती है धड़कता है दिल मेरा

एक ऐसा दिल उनके भी पास हो जाये



हर मुलाकात के बाद रहे हसरत दीदार की

ऐसे मिले हम दूर वस्ल की प्यास हो जाये



तड़पता है दिल उनके लिये तन्हाई में कितना

बेताबी भरा जज़्बात उधर भी काश हो जाये



तश्नाकामी इस कदर रहे नामौजुदगी में उनकी

जैसे सूखी जमीं को सबनमी तलाश हो जाये



करे तफ़सीर कैसे दिल उल्फत का ब्यां… Continue

Added by Subodh kumar on September 19, 2010 at 9:44pm — 10 Comments

कहानी - वह सामने खड़ी थी

वह सामने खड़ी थी . मैं उसकी कौन थी ? क्यों आई थी वह मेरे पास ? बिना कुछ लिए चली क्यों गयी थी? न मैंने रोका, न वह रुकी. एक बिजली बनकर कौंधी थी, घटा बनकर बरसी थी और बिना किनारे गीले किये चली भी गयी . कुछ छींटे मेरे दामन पर भी गिरे थे. मैंने अपना आँचल निचोड़ लिया था. लेकिन न जाने उस छींट में ऐसा क्या था कि आज भी मैं उसकी नमी महसूस करती हूँ - रिसती रहती है- टप-टप और अचानक ऐसी बिजली कौंधती है कि मेरा खून जम जाता है -हर बूंद आकार लेती है ; तस्वीर बनती है -धुंधली -धुंधली ,सिमटी-सिमटी फिर कोई गर्म… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 19, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

हे कृष्ण तुम्हे आना होगा....

माँ के आँचल से छीन जहाँ

नवजात मृत्यु ले जाती हो..

सत्ता पैशाची हर्षित हो

इस पर कहकहा लगाती हो...



आतंकी अत्याचारी ही,

जिस कालखंड के शासक हों ,

जब स्वार्थ नीति से प्रेरित हो

शासन समाज का त्रासक हो...



जहाँ बचपन ढोर चराने में

उलझे, शिक्षा से दूर रहे...

जहाँ समझदार भी सत्यवचन

न कहने को मजबूर रहें....



जहाँ विषधर नदियों के जल में

कुंडली मार कर बैठे हों ,

जो मानदंड हों श्रद्धा के,

श्रद्धालुजनों से ऐंठे… Continue

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on September 19, 2010 at 4:00pm — 2 Comments

तकल्लुफ

इस बार वो ये बात अजब पूछते रहे

मेरी उदासियो का सबब पूछते रहे

अब ये मलाल है कि बता देते राज़-ऐ-दिल

तब कह सके न कुछ भी वो जब पूछते रहे

Added by Hilal Badayuni on September 19, 2010 at 4:00pm — 6 Comments

नाकाम वफाएं

छोड़ कर वो साथ मेरा जब जुदा हो जायेगा ,

ज़ात पैर इंसान की कुछ तब्सिराह हो जायेगा .

हद से ज्यादा कर रहा था मै वफाएं उसके साथ ,

मुझको क्या मालूम था वो बेवफा हो जायेगा .

Added by Hilal Badayuni on September 19, 2010 at 4:00pm — No Comments

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