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Afsos Ghazipuri
  • Male
  • Varanasi, U.P. (India)
  • India
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क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
11 Replies

यह निर्विवादित सत्य है कि जिस प्रकार कोयले के हर टुकड़े मे हीरा नही होता उसी तरह हर बुद्धिजीवी मे कवि भी नही होता ? बहुत प्रयास के बाद हीरा मिलने पर जैसे कारीगर अपने कौशल से तराश कर ‘‘हीरा’’ बनाता है,…Continue

Started this discussion. Last reply by Abhinav Arun Dec 13, 2011.

वास्तविक कवि और शायर
19 Replies

वास्तविक कवि और शायर  हम किसे कहेंगे, उन्हे जो मंचों पर बार-बार दिखाई देते हैं या उन्हें जो मंचों पर दिखने के लिए संघर्ष करते रहते हैं, या उन्हें जिन्हे मंचों पर न आने देने के लिए प्रयास करते हैं…Continue

Started this discussion. Last reply by Pallav Pancholi Nov 22, 2011.

 

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Profile Information

Gender
Male
City State
Varanasi Uttar Pradesh
Native Place
Ghazipur (U.P.)
Profession
Social but Literary Works
About me
Was Producer/Writer/Director of Motion Pictures and Now founder & Mahaamantree of 'Saahityik Sansthaa PARIWARTAN (Regd)', regular writer of Ghazals, collection of 51 Ghazals are self-published entitled "Deewaan-e-Afsos".

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Afsos Ghazipuri's Blog

आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है...

आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है ।

एक ज़वा बेटे का दरया डूब जाना याद है ।



क्या सुनाए कोई नग़मा क्या पढ़ें अब हम ग़ज़ल,

ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस फसाना याद है ।



जश्ने-होली खो गई दीवाली फीक़ी पड़ गई,

अब फ़क़त हर साल इनका आना-जाना याद है ।



सोचते थे अब तलक़ वो छुप गया होगा कहीं,

लौट कर  आया नहीं उसका बहाना याद है ।



कर रहे थे बाग़बानी हम बड़े ही प्यार से,

आज भी…

Continue

Posted on November 26, 2011 at 8:08am — 2 Comments

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

सूरजमुखी का दिन में नज़ारा न कीजिए



महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी

दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए



शरमा के मुँह न फेर ले आईना, इसलिये

ज़ुल्फ़ों को आइने में संवारा न कीजिए



ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप

इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए



एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात

ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए



दिल जिस से चौक जाये किसी राहगीर का

अब उसका नाम ले…

Continue

Posted on November 25, 2011 at 9:14am — 6 Comments

आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा...

एक ग़ज़ल

आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

एक होना, डूब जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

जब अकेले हैं मिले, दीवानगी बढ़ती गई,

सिर हिलाना, भाग जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

हाथ में मेरे, कलाई जब…

Continue

Posted on November 9, 2011 at 12:30am — 4 Comments

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