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Afsos Ghazipuri
  • Male
  • Varanasi, U.P. (India)
  • India
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क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?

Started this discussion. Last reply by Arun Kumar Pandey 'Abhinav' Dec 13, 2011. 11 Replies

यह निर्विवादित सत्य है कि जिस प्रकार कोयले के हर टुकड़े मे हीरा नही होता उसी तरह हर बुद्धिजीवी मे कवि भी नही होता ? बहुत प्रयास के बाद हीरा मिलने पर जैसे कारीगर अपने कौशल से तराश कर ‘‘हीरा’’ बनाता है,…Continue

वास्तविक कवि और शायर

Started this discussion. Last reply by Pallav Pancholi Nov 22, 2011. 19 Replies

वास्तविक कवि और शायर  हम किसे कहेंगे, उन्हे जो मंचों पर बार-बार दिखाई देते हैं या उन्हें जो मंचों पर दिखने के लिए संघर्ष करते रहते हैं, या उन्हें जिन्हे मंचों पर न आने देने के लिए प्रयास करते हैं…Continue

 

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Arun Kumar Pandey 'Abhinav' replied to Afsos Ghazipuri's discussion क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
"बात मोहब्बत से हो तो मज़ा आता है ... वर्ना किसे फुर्सत है अपने ग़म से !!"
Dec 13, 2011
वीनस केसरी replied to Afsos Ghazipuri's discussion क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
"उन उस्तादों को अपने शागीर्दो को बर्बाद करते देखा है हमने जिन्होंने अपना "कहा" दे-दे कर खुद कहने की क्षमता को ही समाप्त कर दिया हैसाहब, इलाहाबाद में मैंने भी ऐसे बहुत लोग को देखा है ऐसे लोग शाइर हो सकते हैं,,, बहुत अच्छे शायर भी हो सकते हैं…"
Nov 30, 2011
वीनस केसरी replied to Afsos Ghazipuri's discussion क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
"अफ़सोस साहब,मैं क्या और मेरा वजूद क्या...इस वेबसाईट पर पहले दिन से ही मुझसे कई गुना ज्यादा अनुभवी लोग मौजूद है परन्तु कुछ बात थी कि जब गज़ल की बात होती थी तो वो लोग उतना खुल कर बात नहीं करते थे जितना किसी को सीखने के लिए अपेक्षित होता (कहीं न कहीं यह…"
Nov 30, 2011
Afsos Ghazipuri replied to Admin's discussion एक और घोषणा :- "महीने की सर्वश्रेष्ट रचना पुरस्कार"
"बधाई हो !!!नगद पुरस्कारों की घोषणा की बाढ़ लगाते जा रहे हैं और मुझे लगाने लगा है की कभी की सुनी हुई बात को भुलाना पड़ेगा, आप भी सुन लें ---"माना की मुफ़लिसी है न बेचो अपने ज़मीर कॉ, हालात जब बदलेंगे ग़ुरबत सताएगी I ले.कर खड़े हो …"
Nov 30, 2011
Afsos Ghazipuri replied to Afsos Ghazipuri's discussion क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
"विंनस जी, ओ.बि.ओ. जब भी देखता हूँ आप छाए रहते हैं, अच्छी बात है की इतना वक्त निकाल पाते हैं आप. उन उस्तादों को अपने शागीर्दो को बर्बाद करते देखा है हमने जिन्होंने अपना "कहा" दे-दे कर खुद कहने की क्षमता को ही समाप्त कर दिया है. पते की बात…"
Nov 30, 2011
वीनस केसरी replied to Afsos Ghazipuri's discussion क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?
"नमस्ते,कोयले के हर टुकड़े मे हीरा नही होता उसी तरह हर बुद्धिजीवी मे कवि भी नही होताकितनी सच्ची बात कह दी आपने क्या स्वयंभू गुरुजन इससे अधिक भावी ‘‘कवि’’ के लिए करने मे सक्षम हो सकते हैकविता का तो नहीं पता मगर शाइरी बिना उस्ताद…"
Nov 29, 2011
Afsos Ghazipuri posted a video
Moods Slideshow: AFSOS’s trip to Varanasi, Uttar Pradesh, India was created by TripAdvisor. See another Varanasi slideshow. Take your travel photos and make a slideshow for free.

Moods

Nov 29, 2011
Afsos Ghazipuri posted a discussion

क्या कवि या शायर गढ़े जा सकते है ?

यह निर्विवादित सत्य है कि जिस प्रकार कोयले के हर टुकड़े मे हीरा नही होता उसी तरह हर बुद्धिजीवी मे कवि भी नही होता ? बहुत प्रयास के बाद हीरा मिलने पर जैसे कारीगर अपने कौशल से तराश कर ‘‘हीरा’’ बनाता है, क्या स्वयंभू गुरुजन इससे अधिक भावी ‘‘कवि’’ के लिए करने मे सक्षम हो सकते है ? मेरी समझ मे ‘ना’ है, आपकी समझ मे ‘हा’ हो सकता है लेकिन, सोच कर तो देखिए ऐसे ‘क्लोन-कवियो’ से साहित्य का क्या भला होने वाला है सिवाय इसके कि इस तरह की भीड़ मे ..... ?See More
Nov 27, 2011
Ganesh Jee "Bagi" commented on Afsos Ghazipuri's blog post छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
"ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आपइतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए वाह वाह गाजीपुरी से बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल की प्रस्तुति है, सभी शेर मखमली अंदाज में कहे गए है, मतला से मकता तक तारीफ़ के योग्य है दाद कुबूल करे | "
Nov 26, 2011
Saurabh Pandey commented on Afsos Ghazipuri's blog post आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है...
"आदरणीय अफ़सोससाहब,  एक विभूति के अफ़सोस बन जाने की प्रक्रिया को तिल-तिल समेटना आँखों की निर्निमेष कोर को पनिया गया. घोष-स्वर में सुनना और फिर छूना...  आह ! साहब.. .!!  कुछ बीत चुके पल यों होते हैं जिनका वज़ूद पत्थर के पटल पर बनी लहरों की…"
Nov 26, 2011
Ganesh Jee "Bagi" commented on Afsos Ghazipuri's blog post आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है...
"//आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है । एक ज़वा बेटे का दरया डूब जाना याद है // आह ! मतला दिल को चिर देने वाला है, कुछ बातें तो मरने के बाद ही भूलती हैं | //क्या सुनाए कोई नग़मा क्या पढ़ें अब हम ग़ज़ल,ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस फसाना याद है // कभी कभी…"
Nov 26, 2011
Afsos Ghazipuri posted blog posts
Nov 26, 2011
satish mapatpuri commented on Afsos Ghazipuri's blog post छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
"ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आपइतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए सुभानअल्लाह................... खुबसूरत ख्याल ............ दाद कुबूल फरमाएं हुजुर "
Nov 26, 2011
Saurabh Pandey commented on Afsos Ghazipuri's blog post छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
"आदाब है आदरणीय अफ़सोस जी. पूरी ग़ज़ल रुमानियत और दुनियावी पेंचोखम से गुजरती नये मंजर दिखाती चलती है. महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनीदीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए वल्लाह, क्या ही सलाह है.   एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रातताने ख़ोदा के…"
Nov 26, 2011
वीनस केसरी commented on Afsos Ghazipuri's blog post छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
"बाकमाल अशआर के लिए ढेरो दाद कबूल करेंयह तीन शेर खास पसंद आये महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनीदीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिएऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आपइतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिएवाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ायूँ मैक़दे में रात…"
Nov 25, 2011
Saurabh Pandey commented on Afsos Ghazipuri's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अफ़सोससाहब,   अव्वल तो, मुआफ़ी, कि कैसे अबतक आपकी इस उम्दा ग़ज़ल से महरूम रहा. किसशे’र को हासिल कहूँ ?! या, किस एक पर खुल कर दाद दूँ ..! शोख और अलमस्त अदायग़ी का मुज़ाहिरा करते इन सभी अश’आर पर मेरी दिली दाद कुबूल फ़रमायें. आदाब…"
Nov 25, 2011

Profile Information

Gender
Male
City State
Varanasi Uttar Pradesh
Native Place
Ghazipur (U.P.)
Profession
Social but Literary Works
About me
Was Producer/Writer/Director of Motion Pictures and Now founder & Mahaamantree of 'Saahityik Sansthaa PARIWARTAN (Regd)', regular writer of Ghazals, collection of 51 Ghazals are self-published entitled "Deewaan-e-Afsos".

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आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है...

Posted on November 26, 2011 at 8:08am 2 Comments

आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है ।

एक ज़वा बेटे का दरया डूब जाना याद है ।



क्या सुनाए कोई नग़मा क्या पढ़ें अब हम ग़ज़ल,

ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस फसाना याद है ।



जश्ने-होली खो गई दीवाली फीक़ी पड़ गई,

अब फ़क़त हर साल इनका आना-जाना याद है ।



सोचते थे अब तलक़ वो छुप गया होगा कहीं,

लौट कर  आया नहीं उसका बहाना याद है ।



कर रहे थे बाग़बानी हम बड़े ही प्यार से,

आज भी…

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छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

Posted on November 25, 2011 at 9:14am 6 Comments

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

सूरजमुखी का दिन में नज़ारा न कीजिए



महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी

दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए



शरमा के मुँह न फेर ले आईना, इसलिये

ज़ुल्फ़ों को आइने में संवारा न कीजिए



ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप

इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए



एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात

ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए



दिल जिस से चौक जाये किसी राहगीर का

अब उसका नाम ले…

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आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा...

Posted on November 9, 2011 at 12:30am 4 Comments

एक ग़ज़ल

आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

एक होना, डूब जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

जब अकेले हैं मिले, दीवानगी बढ़ती गई,

सिर हिलाना, भाग जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

हाथ में मेरे, कलाई जब…

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