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रमेश कुमार चौहान
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  • chhatisgarh
  • India
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Latest Activity

रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 76 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिनंदनध्वज की मात्रा 2 है किन्तु लिखते समय दिमाग में 3 हो गया । इस कारण मात्रा की गलती है ।आपके इस विश्लेषण के लिये धन्यवाद कुछ तथ्य व्याकारण रूप से स्पष्ट नही कर पा रहा सो आपने स्पष्ट कर दिया । सादर आभार"
Friday
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 76 in the group चित्र से काव्य तक
"जी, आपके  सुझावों  का  सादर स्वागत, संशोधन  का  प्रयास  करूंगा । सादर"
Friday
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 76 in the group चित्र से काव्य तक
"//सरसी छंद// राष्ट्रीय ध्वज कागज पर गढ़, करते अनुभव गर्व। झंडा वंदन करके बच्चे, मना रहे हैं पर्व।। सावधान की मुद्रा में तन, करते ध्वज प्रणाम । करे शपथ बच्चे मन ही मन, भारत देश महान ।। जिस धरती पर हम जन्म लिये, जिसका है उपकार । वायु अन्न जल देकर…"
Friday
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 74 in the group चित्र से काव्य तक
"//सरसी छंद// शांत उदर की ज्वाला करने, जला रहा वह आग ।ध्यान मग्न वह अपने कारज, नहीं द्वेष अरू राग ।। औजार गढ़े लौह गला कर, जिसका नाम लुहार ।लौह संग निज रक्त जलाता, माने कभी न हार ।। लौह सलाखे भठ्ठी डाले, छेड़ धौकिनी चाल ।हाथ छिनी और हथौड़ा ले, गढ़ते हल…"
Jun 17
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 74 in the group चित्र से काव्य तक
"जी, मार्गदर्शन के लिये सादर आभार, अग्रज"
Jun 17
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 74 in the group चित्र से काव्य तक
"//कुण्डलियां छंद//हाथ हथौड़ा वह लिये, छड़ पर करते वार ।दो पैसे की चाह है, जीने की दरकार ।जीने की दरकार, काम सबको है करना ।बाल युवा अरू वृद्ध, पेट सबको है भरना ।चलना सबको राह, रहे सकरा या चौड़ा ।गढ़ता वह औजार, हाथ पर लिये हथौड़ा…"
Jun 17
रमेश कुमार चौहान commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की : ये नहीं है कि हमें उन से मुहब्बत न रही,
"हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय "
Feb 26
बृजेश नीरज commented on रमेश कुमार चौहान's blog post यथावत रखें संसार (नवगीत)
"नवगीत के लिए छंदबद्धता आवश्यक है. कृपया इस पर काम करें."
Feb 26
रमेश कुमार चौहान commented on रमेश कुमार चौहान's blog post यथावत रखें संसार (नवगीत)
"आदरणीय आरीफजी, सादर नमस्कार, इस रचनापर दृष्टिपात करने आपका सादर अभिनंदन, आभार"
Feb 25
Mohammed Arif commented on रमेश कुमार चौहान's blog post यथावत रखें संसार (नवगीत)
"आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी आदाब, बहुत अच्छा नवगीत । नये बिम्ब-प्रतीकों का प्रयोग हुआ है । बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 25
रमेश कुमार चौहान posted a blog post

यथावत रखें संसार (नवगीत)

एक-दूजे के पूरक होकर यथावत रखें संसारपक्ष-विपक्ष राजनीति में जनता के प्रतिनिधि प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा एक राष्ट्र हो किस विधिअपने पूँछ को शीश कहते दिखाते क्यों चमत्कारहरे रंग का तोता रहता जिसका लाल रंग का चोंच एक कहता बात सत्य है दूजा लेता खरोचसत्य को ओढ़ाते कफन संसद के पहरेदारसागर से भी चौड़े हो गये सत्ता के गोताखोर चारदीवारी के पहरेदार ही निकले कुंदन चोरराजनीति के वायरस से सिस्टम हुआ बीमारसिक्के के दो पहलू होते वाहन के दो पहिये दो-दो के हैं जोड़ जगत में इन्हें शत्रु मत कहियेसमर्थक-विरोधी,…See More
Feb 24
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-74
"इन शब्दों को शब्दकोश से लेकर उपयोग करने का प्रयास किया हूं आदरणिया दीदीजी -(ठीवन-थूक, सीवन-सिलाई का टांका, तीवन-रसेदार तरकारी, खीवन-मतवालापन)सादर"
Dec 10, 2016
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-74
"सेठों को देखा नही,हमने किसी कतार में फुदक-फुदक कर यहां-वहां जबचिड़िया तिनका जोड़ेबाज झपट्टा मार-मार करउनकी आषा तोड़े जीवन जीना है कठिन,दुनिया के दुस्वार में जहां आम जन चप्पल घिसतेदफ्तर-दफ्तर मारे ।काम एक भी सधा नही हैरूके हुयें हैं सारे कौन कहे कुछ बात…"
Dec 10, 2016
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-74
"पंक्ति एक जीवन है साथी पंक्ति एक जीवन है ।दीन-हीन पंक्ति का कैदी, धरती का ठीवन है ।।दो जून पेट का ही भरना, दीनों का तीवन है ।आजीविका ढूंढते यौवन, शिक्षा का सीवन है ।।यक्ष प्रश्न आज पूछथे क्यों, धन बिन क्या जीवन है ।आँख मूंद कर बैठे रहना, राजा का…"
Dec 9, 2016
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 67 in the group चित्र से काव्य तक
"//उल्लाला छंद// गिल्ली डण्ड़ा खेलते, मिलकर बच्चे साथ में ।गिल्ली को उछाल रहे, डण्ड़ा लेकर हाथ में ।। गांव-गली का खेल यह, मिले नहीं परदेश में ।कल की यह गौरव कथा, कहते भारत देश में ।। स्वस्थ रखे यह स्वास्थ को, भरे ताजगी श्वास में ।खेलो मिट्टी धूल में,…"
Nov 19, 2016
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय सादर नमस्कार 9977069545"
Nov 14, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
Nawagarh C.G.
Native Place
Nawagarh
Profession
teacher
About me
छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी में कविता पढ़ना पसंद हैं । कुछ पंक्तियां स्वयं का लिखने का प्रयास रहता है ।

रमेश कुमार चौहान's Blog

यथावत रखें संसार (नवगीत)

एक-दूजे के पूरक होकर

यथावत रखें संसार

पक्ष-विपक्ष राजनीति में

जनता के प्रतिनिधि

प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा

एक राष्ट्र हो किस विधि

अपने पूँछ को शीश कहते

दिखाते क्यों चमत्कार

हरे रंग का तोता रहता

जिसका लाल रंग का चोंच

एक कहता बात सत्य है

दूजा लेता खरोच

सत्य को ओढ़ाते कफन

संसद के पहरेदार

सागर से भी चौड़े हो गये

सत्ता के गोताखोर

चारदीवारी के पहरेदार ही

निकले कुंदन…

Continue

Posted on February 23, 2017 at 6:00pm — 3 Comments

राजनीति (नवगीत)

घुला हुआ है

वायु में,

मीठा-सा  विष गंध



जहां रात-दिन धू-धू जलते,

राजनीति के चूल्हे

बाराती को ढूंढ रहे  हैं,

घूम-घूम कर दूल्हे



बाँह पसारे

स्वार्थ के

करने को अनुबंध



भेड़-बकरे करते जिनके,

माथ झुका कर पहुँनाई

बोटी-बोटी करने वह तो

सुना रहा शहनाई



मिथ्या-मिथ्या

प्रेम से

बांध रखे इक बंध



हिम सम उनके सारे वादे

हाथ रखे सब पानी

चेरी, चेरी ही रह जाती

गढ़कर राजा-रानी



हाथ… Continue

Posted on November 4, 2016 at 2:57pm — 3 Comments

चवपैया छंद

(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

Posted on September 25, 2016 at 7:30am — 2 Comments

भाषा यह हिन्द (त्रिभंगी छंद)

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत माँ के, माथ भरे ।
जन-मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
क्यों पर्व मनायें,क्यों न बतायें, हिन्दी निशदिन, कंठ सने ।।

Posted on September 14, 2016 at 12:00pm — 5 Comments

Comment Wall (3 comments)

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At 10:28pm on November 24, 2013, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

चौहान जी

हम सब यहाँ सीखते है i हो सकता है कल मै आप से कुछ पा सकू  i आभार i

At 8:47pm on September 5, 2013, mrs manjari pandey said…

      

      आदरणीय चौहाण जी हार्दिक आभार .

At 9:33pm on August 24, 2013, बृजेश नीरज said…

ओबीओ पर आपका हार्दिक स्वागत है!

 
 
 

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