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यथावत रखें संसार (नवगीत)

एक-दूजे के पूरक होकर
यथावत रखें संसार

पक्ष-विपक्ष राजनीति में
जनता के प्रतिनिधि
प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा
एक राष्ट्र हो किस विधि

अपने पूँछ को शीश कहते
दिखाते क्यों चमत्कार

हरे रंग का तोता रहता
जिसका लाल रंग का चोंच
एक कहता बात सत्य है
दूजा लेता खरोच

सत्य को ओढ़ाते कफन
संसद के पहरेदार

सागर से भी चौड़े हो गये
सत्ता के गोताखोर
चारदीवारी के पहरेदार ही
निकले कुंदन चोर

राजनीति के वायरस से
सिस्टम हुआ बीमार

सिक्के के दो पहलू होते
वाहन के दो पहिये
दो-दो के हैं जोड़ जगत में
इन्हें शत्रु मत कहिये

समर्थक-विरोधी, बाल-वृद्ध
खास-आम, नर-नार

..............................
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश नीरज on February 26, 2017 at 9:42am

नवगीत के लिए छंदबद्धता आवश्यक है. कृपया इस पर काम करें.

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 25, 2017 at 7:19pm

आदरणीय आरीफजी, सादर नमस्कार, इस रचनापर दृष्टिपात करने आपका सादर अभिनंदन, आभार

Comment by Mohammed Arif on February 25, 2017 at 9:36am
आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी आदाब, बहुत अच्छा नवगीत । नये बिम्ब-प्रतीकों का प्रयोग हुआ है । बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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