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समीक्षा - परों को खोलते हुए-1 : एक पाठकीय प्रतिक्रिया -राहुल देव

हिंदी साहित्य जगत के पंद्रह रचनाकारों का संयुक्त काव्य संग्रह ‘परों को खोलते हुए-1’ मेरे हाथ में है | इस संकलन में हिंदी काव्यजगत के पंद्रह विविध रचनाकारों की चुनिन्दा छन्दमुक्त कविताओं की प्रस्तुति श्री सौरभ पाण्डेय जी के कुशल संपादन में हुई है |

 

एक पाठक की नज़र से अगर प्रारंभ से देखना शुरू करें तो सर्वप्रथम अरुण कुमार निगम की कवितायेँ हैं | आपकी कविताओं में एक परिपक्वता है, जोकि कविहृदय की मार्मिक भावाभिव्यक्तियाँ हैं | जीवन-जगत का सूक्ष्म अन्वेषण इनकी कविताओं में देखने को मिलता है |

कुछ पंक्तियाँ जो कि मुझे अच्छी लगीं आपसे बांटना चाहूँगा-

‘धुंधली आँखें/ जर्जर काया/ चप्पे-चप्पे ढूँढा मैंने......(मेरुदंड झुका जाता है शीर्षक कविता से),

सब करते थे प्रेम/ चुप-चुप दोहरी-तिहरी बातें/ एक गाँव हुआ करता था यहाँ !....(कुँए की पीड़ा शीर्षक कविता से)

 

इस क्रम में अगले रचनाकार अरुण श्री युवा हैं | अपनी विशिष्ट शैली में रची गयीं इनकी कवितायेँ उच्चकोटि की हैं | कविताकर्म के प्रति उनके गंभीर विचारबोध और उनकी संवेदनशीलता भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है | कुछ पंक्तियाँ जो कि मुझे अच्छी लगीं- ...

‘कैसे कहता?/ जिसके लिए लिखता था अब वो रूठ चुका है/ जिस रिश्ते पर अहंकार था- टूट चुका है/ अब तो जितना हो सकता है खुश रहता हूँ/ दिल तो दुखता है लेकिन अब चुप रहता हूँ/ अब मैं दर्द नहीं लिखता हूँ !!’ (कैसे कहता शीर्षक कविता से),

‘मृतपाय शिराओं में बहता हुआ/ संक्रमण से सफ़ेद हो चुका खून/ गर्म होकर गला देता है तुम्हारी रीढ़ !/ और तुम/ अपनी आत्मा पर पड़े फफोलों से अनजान/ रेंगते हुए मर्यादा की धरती पर/............./ तुम्हारे गर्म सांसों का अंधड़/ हिला देता है जड़ तक/ एक छायादार वृक्ष को !/ और फिर कविता लिखकर/ शाख से गिरते हुए सूखे पत्तों पर/ तुम परिभाषित करते हो प्रेम को !/ जबकि तुम्हारी भी मंशा है / कि ठूंठ हो चुका पेड़ जला दिया जाए/ तुम्हारी वासना के चूल्हे में/ जिस पर पकता रहेगा एक निर्जीव सम्बन्ध !....(प्रेम शीर्षक कविता से),

‘...तुम थोड़ी-थोड़ी मुझमे रहती हो/ पास तुम्हारे छूट गया हूँ थोड़ा मैं भी !’ (बची हुई तुम शीर्षक कविता से), ....

’तुम्हारे रुदन और मौन के बीच खड़ा कवि/ लिखना चाहता है-/ प्रेम पर एक जरूरी कविता !’ (एक ज़रूरी कविता शीर्षक कविता से),

मुझे पसंद है कवितायेँ लिखना/.........../मेरा कवि बीमार है शायद ! (मुझे क्षमा करें शीर्षक कविता से)

 

कुंती मुखर्जी की कवितायेँ समकालीन स्त्री रचनाकारों की परंपरागत सृजनधारा से अलग यथार्थबोध लिए हुए जीवन के बहुआयामी पक्षों को उजागर करती हुई चलतीं हैं | वास्तव में कवि और उसकी कविता का मूल उद्देश्य पाठक या श्रोता के मन में अपनी रचना के माध्यम से बिम्ब ग्रहण कराने का रहता है मात्र अर्थ ग्रहण कराने का नहीं | आपकी कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं-

‘प्रकृति ! तुम ही आनंद, तुम ही चिरंतन/ जड़-चेतन पाते तुमसे व्यवहार/ तुम ही से होते अरूप/ तुम ही सब कारणों की कारण/ मोह-माया का चक्र परिवर्तन/.....’(प्रकृति शीर्षक कविता से),

‘...मन का भ्रम/ प्यास बन और भटकाएगा/ पथिक !/ शाम होने में अब देर ही कहाँ है ?/ जबकि तुम्हारी झोली खाली है/ सूरज की ओर अब मुड़ के न देखो/ कोई नहीं साथ देने वाला/ कोई नहीं, अपने भी नहीं/ बढे चलो ! पथिक ! बढ़े चलो !!’ (पथिक शीर्षक कविता से),

‘....कुछ तारे लुप्त नहीं होते हैं कभी/ टूट कर भी/ बस जाते हैं दिमाग में/ झटक कर सर अपना/ करतीं हूँ कमरे में उजाला....’(मैं अपने को ढूँढूं कहाँ शीर्षक कविता से),

‘इंसान अपने दिल-दिमाग में/ कहाँ से इतनी नफरत और रोष भर लेता है ?/...../ सूना कमरा/ सूनी छत/ एक शून्य घूरने के लिए../ अगर इंसान प्रेम बांटता/ बदले में प्रेम ही पाता/ जोड़ता गर शुरू में/ अंत क्यों होता अकेला ?/ दुःख देकर किसने सुख पाया है ! (विष के बीज शीर्षक कविता से)

 

जैसा कि संपादक ने भी लिखा है केवल प्रसाद सत्यम एक नैसर्गिक रचनाकार हैं और एक नैसर्गिक रचनाकार कभी आत्मावलोकन करता है तो कभी समाज की विडम्बनाओं से व्यथित उसके अन्दर का कविमन कविताओं के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया करता है | सत्यम की कविताओं में भी यही दृष्टि दिखाई पड़ती है | कुछ पंक्तियाँ देखें-

‘मैं हूँ कौन?/ मैं हूँ मौन !...’ (मैं हूँ मौन शीर्षक कविता से),

‘....आज तीसरा दिन था/ जब उसने सत्तू की अंतिम मुट्ठी/ लोटे में घोलकर/ पांच बार पी थी/ आज बस बूँद की ताकत पर/ रोजगार की खोज के लिए तैयार हो रहा था’ (रोजगार शीर्षक एक मर्मस्पर्शी कविता से),

‘...अनवरत मानव जीवन/ कुंठित, पद दलित रहा/ इसके भविष्य निर्धारण में/ स्मृतियाँ-व्यवस्थाएं तक/ असफल रहीं’ (अलगाववादी शीर्षक कविता से),

‘दिल्ली में शराब का बेजोड़ असर/ पंद्रह अमर/ निस्शेष पचहत्तर/ तंत्र बेखबर/ प्रशासन तर-बतर...’ (शराब शीर्षक कविता से)

 

गीतिका वेदिका प्रतिभाशाली व सम्भावनाशील रचनाकार हैं | उनकी कविताओं में स्त्री-पुरुष के पारस्परिक अंतर्संबंधों का अन्वेषण दिखाई पड़ता है | उनकी कविताओं की मेरी कुछ प्रिय पंक्तियाँ आप भी देखें-

‘....तुम्हें देख रहीं हैं मेरी आँखें/ ताक रहीं हैं मेरी राहें/ थामना चाह रहीं हैं बाहें/ लेकिन तुम नहीं हो/ बहुत दूर-दूर तक....’ (सुनो तुम शीर्षक कविता से),

‘....हमारे मिलने की घड़ी/ अधीर हो रही है/ क्या तुम्हें नहीं लगता/ कि हमें अब मिलना चाहिए ?...’ (देर हो रही है शीर्षक कविता से),

‘तुम्हारा नाम नहीं पता/ तुम्हें पुकारूँ कैसे...’ (तुम्हें पुकारूँ कैसे शीर्षक कविता से)

 

सज्जन धर्मेद्र की कवितायेँ उन्मुक्त हैं, वे बेबाकी से तथ्यों की पड़ताल करते हैं | उनकी कवितायेँ अपने उद्देश्य में सर्वथा सफल हैं | कुछ उदाहरण देखिये-

‘....सिस्टम अजेय है/ सिस्टम सारे विश्व पर राज्य करता है/ क्योंकि ये पैदा हुआ था दुनिया जीतने वाली जाति के/ सबसे तेज और सबसे कमीने दिमागों में’ (सिस्टम शीर्षक कविता से),

‘....जिन्हें हम रंगीन वस्तुएं कहते हैं/ वे दरअसल दूसरे रंगों की हत्यारी होती हैं/...../ जो वस्तु जितना ज्यादा चमकीली होती है/ वो उतना ही बड़ा झूठ बोल रही होती है’ (रंगीन चमकीली चीजें शीर्षक कविता से),

‘...तंत्र के लड़ने के दो ही तरीके हैं/ या तो आग बुझा दी जाय/ या पानी नाली में बहा दिया जाय/ और दोनों ही काम/ पानी से बाहर रहकर ही किये जा सकते हैं/ मेढकों से कोई उम्मीद करना बेकार है’ (लोकतंत्र के मेढक शीर्षक कविता से),

‘....ये देवताओं और राक्षसों का देश है/ यहाँ इंसानों का जीना मना है’ (देवताओं और राक्षसों का देश शीर्षक कविता से),

‘डर हिमरेखा है/ जिसके ऊपर प्रेम के बादल भी केवल बर्फ बरसाते हैं/ हरियाली का सौन्दर्य इस रेखा के नीचे है/ दूब से बांस तक/ हरा सबके भीतर होता है / हरा होने के लिए सिर्फ हवा, बारिश और धूप चाहिए /....../ लोग कहते हैं बरसात के मौसम में पहाड़ों का सीजन/ नहीं होता/ हर बारिश में कितने ही पहाड़ आत्महत्या कर लेते हैं....’ (तुम, बारिश और पहाड़ शीर्षक कविता से)

 

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा वरिष्ठ रचनाकार हैं इन नाते भविष्य के प्रति उनकी चिन्तादृष्टि सहज ही दृष्टिगोचर होती है | उनके अन्दर के कवि का दर्द उनकी रचनाओं के माध्यम से आमजनों का दर्द बनकर मुखर हुआ है | आपकी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-

‘ भोर हुई/ छायी अरुणाई/ टेसू से कपोल/ मन रहा डोल...’ (लगता है वसंत आ गया शीर्षक कविता से),

‘नहीं जानता इन्कलाब क्या है/ शायद आप जानते हों/ हिंदी उर्दू अरबी फ़ारसी अंग्रेजी, ये कौन सा लफ्ज़ है ?/ पञ्च तत्व है?/ पञ्च इन्द्रियां हैं ?/ पञ्च कर्म हैं/ या मुर्दा कौमों की संजीवनी बूटी है?’ (इन्कलाब क्या है शीर्षक कविता से),

‘पक्षियों का कलरव/ जल प्रपात, समुद्र की गोद में खेलतीं लहरें/ धुआं उगलते कारखाने/ फर्राटा भरती गाड़ियाँ/ शोर हर तरफ घुटता दम/ इसके बीच हम....’ (शांति शीर्षक कविता से),

इसके अतिरिक्त आपकी कविता ‘मैं कौन हूँ ?’ भी मुझे बहुत पसंद आयी |

 

डॉ. प्राची सिंह की कवितायेँ स्थूल से सूक्ष्म की ओर सतत रूप से प्रवाहमान एक दार्शनिक अंतर्यात्रा के समान हैं | भाव और विचार के कई स्तरों पर उनकी कवितायेँ बेहद प्रभावशाली बन पड़ी हैं | कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

‘...अर्थ की बंदिशों से परे/ ऊर्जित भाव स्पंदन/ अपनी अनुगूंज में/ चिदानन्द संजोये-/ उसके चन्द शब्द !!’ (चन्द शब्द शीर्षक कविता से),

‘प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन/ कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण/ अटल काल पर/ पदचिन्हों की थाप छोड़ता/ बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना.../ बंधन ये अन-अंत पुराना सा लगता है ?/ क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है ?’ (अनसुलझे प्रश्न शीर्षक कविता से),

‘....ये अनछुआ चैतन्य ही तो है/ जो ले जा रहा है हमें/ अज्ञान के अन्धकार से दूर/ एक नयी दृष्टि के साथ/ सत्य के और करीब’ (अनछुआ चैतन्य शीर्षक कविता से),

‘....टूट जाए मेरे भीतर/ मेरे ही देह बोध की ये दीवार/ अभी इसी क्षण/ करती मुझे आज़ाद/ हर बंधन से..../काश ! (देह बोध शीर्षक कविता से),

‘....पारदर्शी निगाहों में प्रेमाश्रु लिए/ एकटक निहारती हूँ/ प्रकृति की सम्पूर्णता को/ अक्सर करती/ अनकही अनसुनी अनगिन बातें...(अनगिन बातें शीर्षक कविता से)

 

ब्रजेश नीरज की सभी कवितायेँ उच्च यथार्थबोध लिए हुए हैं जोकि उनके मन के भावों का काव्य की छन्द मुक्त शैली में सटीक अंकन हैं | ब्रजेश साहित्य जगत में अपनी सक्रियता तथा रचनाकर्म की विशिष्टता से प्रभावित करते हैं | उनकी कुछ पंक्तियाँ देखें-

‘आखिरी बार कब चिल्लाये थे तुम/याद है तुम्हें?....../अपनी भूख मिटाने के लिए चिल्लाना ज़रूरी है/ चिल्लाना ज़रूरी है/ अस्तित्व बचाने के लिए’ (चिल्लाओ कि जिन्दा हो शीर्षक कविता से),

‘...खामोश रहना/ जीवन की सबसे खतरनाक क्रिया होती है/ आदमी पत्थर हो जाता है’ (पत्थर शीर्षक कविता से),

‘....गहराते अन्धकार में/ गुमसुम सा मैं/ हिसाब करता रहा/ दिन का लेखा जोखा/ हताश व निराश/ असफलताओं का घेरा/ फिर भी दिल के कोने में/ एक सूर्य दैदीप्यमान है/ अब भी/ कल को प्रकाशित करने के लिए’ (सूरज शीर्षक कविता से)

 

आगे चलें तो महिमा श्री की कविताओं में वर्तमान दौर की सामाजिक विद्रूपताओं के प्रति छटपटाहट दिखाई पड़ती है | उनकी कवितायेँ कई सवाल करतीं हैं जिनके जवाब हमें ही देने होंगे | इनकी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- ‘...चलो एक दीप जला लें/ जुगनुओं को दोस्त बना लें/ अपनेपन के शोर से गुंजित कर लें/ अंतस का कोना’ (अंतस का कोना शीर्षक कविता से),

‘तुम्हारा मौन/विचलित कर देता है/ मन को/ सुनना चाहती हूँ तुम्हें/ और/ मुखर हो जातीं हैं दीवारें, कुर्सियां, दरवाज़े/ टेबल-चमचे.../सभी तो बोलने लगते हैं/ सिवाय तुम्हारे’ (तुम्हारा मौन शीर्षक कविता),

‘रोज अलस्सुबह उठ के जातीं हूँ/ शाम को आती हूँ/ दूर से देखती हूँ/ कहती हूँ/ ओह देखो तो ज़रा/ कितनी भीड़ है/ और फिर/ मैं भी भीड़ हो जाती हूँ’ (भीड़ शीर्षक कविता)

 

वंदना तिवारी नवागत हैं, उनकी कवितायेँ परम के प्रति भावान्जलियों का अर्पण हैं | उनकी कविताओं में जीवन-जगत व स्वयं के प्रति दायित्वबोध दिखाई देता है | मेरी पसंद की कुछ पंक्तियाँ देखें-

‘....आज.../भावेश का बहाव बदल गया/ साहित्य का उद्देश्य बदल गया/ परिवेश बदल गया..’ (परिवेश बदल गया शीर्षक कविता से)

 

विजय निकोर भी इस संकलन के एक वरिष्ठ कवि हैं | उनकी कविताओं में पाठक एक रूमानी जुड़ाव महसूस करता है | प्रकृति, जीवन, जगत और समय के दार्शनिक सरोकारों की बात करतीं उनकी कवितायेँ भाषा, कथ्य व शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट बन पड़ी हैं | कविताओं की कुछ पंक्तियाँ देखें-

‘पिछवाड़े से आकर दबे पाँव जैसे/ तुम करतीं थीं शीशे पर/ टक-टक-टक/ और फिर एक चुलबुली हंसी हवा में/ हवा को मदहोश करती/ बावरी हवा..हंसती चली जाती थी/ आज उसी खिड़की के शीशे पर/ बारिश की बूंदों की टप-टप, टप-टप...’ (बारिश की बूँदें शीर्षक कविता से),

‘....अब मैं शब्दों से नहीं/ शब्दों के प्रकरण से डरता हूँ...’ (मौन में पलने दो)

 

विन्धेश्वरी प्रसाद त्रिपाठी ‘विनय’ युवा हैं | उनकी कविताओं में उनकी उर्जस्वित विचारदृष्टि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है | देखिये-

‘...कुत्सित आवरणों के बीच/तोड़ना चाहता हूँ/ अंतर्द्वंद्वों का इस्पाती घेरा/ जो मेरे स्व को जकड़े हुए हैं/...../ मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ/ क्या कहूँ मैं ?..क्या करूँ मैं ?’ (खुद की तलाश शीर्षक कविता से)

 

शरदिंदु मुखर्जी भी वरिष्ठ हैं, अनुभवी हैं | उनकी कवितायेँ साहित्य के माध्यम से आदमी में ‘आदमी’ की तलाश करतीं हैं | व्यक्ति के सतत जीवन संघर्षों के बीच उसके सपनों की आने वाली सुबह जिसके पीछे तमाम कटु व तिक्त अनुभव छिपे हुए होते हैं इन सब परिस्थितियों से पार पाने के बाद मिलने वाला आनंद, आनंद मात्र नहीं बल्कि परमानन्द बन जाता है | अंतर्जगत की आँखें खुलने के बाद कुछ भी अज्ञात नहीं होता | अज्ञात से ज्ञात की ओर निरंतर बहने का यह सुखद प्रवाह निश्चित रूप से भावी पीढ़ी का मार्गदर्शक भी बनता है | कुछ पंक्तियों के माध्यम से आप खुद ही देखिये-

‘हकीकत की सफ़ेद दीवार पर/ तजुर्बों की भीड़ ने/ अहसास नाम की/ नन्हीं सी कील ठोक दी थी...’ (एक कील, एक तस्वीर शीर्षक कविता से)

 

संकलन के अंत में शालिनी रस्तोगी की कवितायेँ हैं, आपकी कवितायेँ स्वयं का मनोवैज्ञानिक आकलन हैं अब इसे ही आप आत्ममन्थन कहें चाहे खुद के जीवन की गति और ठहराव के बीच समय को असम्पृक्त होकर अपने नजरिये से देखते रहने की एक प्रक्रिया | इनकी कवितायेँ आत्मशोधन के माध्यम से इस बात को रेखांकित करती हुई चलतीं हैं जिसके अनुसार, ‘जीवन का इस जगत का सबसे बड़ा सत्य यह है कि आप अकेले हैं !’ कुछ पंक्तियाँ देखें तो-

‘तुमको पढूं तो कैसे/ कोई मतलब निकालूँ तो कैसे/ कि होश में तो तुम्हें लिखा ही नहीं/ और अब/ बार-बार बांचती तुम्हें/ जतन करतीं हूँ/ कोई मतलब निकालने का...’ (अनगढ़-सी इबारत कविता से),

‘...हृदय हर्षाया/ तन की पुलक से/ हरियाई थी दूब/ भावों का अतिरेक/ जल-कण बन/ नयन से टपका/ और ओस बन ठहर गया/ त्रण नोक पर/...’ (आत्म मुग्धा शीर्षक कविता से),

‘...बीते हुए और आने वाले/ लम्हों में खोये/ हम/ वर्तमान में कब जीते हैं ? (हम वर्तमान में कब जीते हैं शीर्षक कविता से) |

 

पुस्तक का आवरण आकर्षक, मुद्रण स्वच्छ व त्रुटिहीन है | इस संग्रहणीय संकलन के सभी पंद्रह कवि/कवियत्री सृजन के नवोन्मेषशाली पथ के अन्वेषी बनेंगे, ऐसा विश्वास है | अंजुमन प्रकाशन सहित संपादक और सभी शामिल रचनाकारों को मैं इस शानदार प्रस्तुति के लिए हृदयतल से बधाई और साधुवाद देता हूँ ! पाठकों को इस कड़ी की अगली प्रस्तुति का भी बेसब्री से इंतज़ार रहेगा |

 
पुस्तक - परों को खोलते हुए - 1 / संपादक - सौरभ पाण्डेय / 160 पृष्ठ / मूल्य - 170 / प्रकाशन - अंजुमन प्रकाशन 
 
समीक्षक -
राहुल देव
संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य-सदन, कोतवाली मार्ग,

महमूदाबाद (अवध), सीतापुर (उ.प्र.) 261203

ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

मो- 09454112975

 

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Replies to This Discussion

अंजुमन प्रकाशन का यह संग्रह साहित्य जगत को समकालीन कलमकारों की नयी पौध से रूबरू कराने का स्तुत्य प्रयास है ...प्रकाशन संस्थान और रचनाकारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें ! निश्चित ही रचनाएँ वर्तमान के स्वर को शब्द देती प्रतीत हो रही हैं ... सफल ...मंगल कामनाएं ! और श्री राहुल जी के प्रति भी आभार और इस उत्तम \ परिचयात्मक पोस्ट के लिए साधुवाद ... पुस्तक के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है इसे पढ़ कर ...अग्रज श्री के कुशल संपादन के लिए नमन वंदन ..परों को खोलते हुए ..... सुरभित ...सुवासित ..है !!!

इस उत्तम और त्वरित समीक्षा के लिए आदरणीय राहुल देव जी का हार्दिक आभार!

आदरणीय ब्रिजेश जी राहुल देव जी ने पुस्तक की प्री बुकिंग की थी और पुस्तक उनको १५ तारीख को भेज दी गई थी ...

इसके लिए राहुल देव जी का विशेष आभार!

'परों को खोलते हुए -१ ' संकलन पर आ० राहुल देव जी को पाठकीय समीक्षा के लिए सादर धन्यवाद .

आपने सभी लेखकों की रचनाओं से गुज़र पर तथ्यपरक चिंतन प्रधान पद्यांशों को प्रस्तुत किया है साथ ही हर रचनाकार की रचनाओं की मूल अंतर्धारा को हृदयंगम कर अपने शब्दों में सामने रखा है.

इस महती संवेदनशील समीक्षा के लिए पुनः धन्यवाद 

डॉ० प्राची 

सर्व प्रथम स्नेही राहुल जी को धन्यवाद 

१- पुस्तक क्रय कर पढ़ने हेतु. 

२- सुन्दर सार्थक समीक्षा करने हेतु. 

आसान नहीं होता किसी पुस्तक, लेखक और उसके विषय की  सफल समीक्षा करना . दिखता आसान है . फिर एक नवजवान द्वारा. बधाई. वे तरक्की करें इस आशीर्वाद के साथ. 

जय हो 

मंगलमय हो 

रचनाओं की विस्तृत रूप से समीक्षा के लिए राहुल जी बधाई के पात्र हैं।  सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई व शुभ कामनाएँ।

आ0 रामानी दी जी,   आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

आ0 राहुल देव भार्इ जी,   "परों को खोलते हुए-1" पर समीक्षात्मक विचार-विमर्श एवं यथार्थ तथ्यात्मक भावाभिव्यकितयों को साझा करने हेतु आपके विशेष स्नेह और सार्थक विश्लेषण हेतु आपका प्रभूत हार्दिक आभार।  सादर,

भाई राहुलदेव जी को इस सकारात्मक और द्रुत प्रयास के लिए हार्दिक धन्यवाद.

आपने आलोच्य काव्य संग्रह में सम्मिलित रचनाओं पर अपनी भावनाओं को साझा किया है. चूंकि यह संग्रह सम्पादन प्रयास का परिणाम है अतः यदि राहुलदेव जी ने आलोच्य संग्रह की कतिपय रचनाओं के सापेक्ष सम्पादकीय प्रयास को गुनने का प्रयास किया होता तो अधिक सार्थक बात होती. फिर भी आपका प्रत्येक रचनाकार की सभी रचनाओं को पढ़ कर पाठकों के सामने अपनी पसंद की पंक्तियों को उद्धृत करना प्रभावित कर गया.

भाई राहुलजी के पाठकीय संयतपन को हार्दिक धन्यवाद.

एक सार्थक प्रयास के लिए बारम्बार बधाई.

शुभ-शुभ

'परों को खोलते हुये अंक -१' की समीक्षा राहुल जी कलम से प्राप्त हुयी| अति हर्ष का विषय है, और कि किताब की  समीक्षा एक 'नवहस्ताक्षर' के द्वारा हुयी और आपने हमारी किताब को खरीद कर हमें प्रोत्साहित किया| जबकि हमें ज्ञात है कि समीक्षक के पास  पहले ही किताब उपलब्ध हो जाती है| :-)

आभार व्यक्त करती हूँ!

राहुल देव जी का तह-ए-दिल से आभारी हूँ कि उन्होंने इतनी विस्तृत पाठकीय प्रतिक्रिया लिखी जो कमोबेश एक समीक्षा बन गई है। आदरणीय सौरभ जी के संपादन के बगैर यह संभव नहीं होता इसलिए राहुल देव जी से मेरा निवेदन है कि इसमें संसोधन कर उनके संपादन के बारे में भी कुछ कहें ताकि यह एक संपूर्ण समीक्षा हो जाय और आगे संदर्भ हेतु प्रयोग की जा सके।

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