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आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ अठहत्तरवाँ योजन है।

   

 

छंद का नाम  -  दोहा छंद   

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से

19 अप्रैल 26 दिन रविवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

दोहा छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

***************************

आयोजन सम्बन्धी नोट 


फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ :

18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से

19 अप्रैल 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। 

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
  2. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
  3. सदस्यगण संशोधन हेतु अनुरोध  करें.
  4. अपने पोस्ट या अपनी टिप्पणी को सदस्य स्वयं ही किसी हालत में डिलिट न करें. 
  5. आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति संवेदनशीलता आपेक्षित है.
  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
  7. रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. 
  8. अनावश्यक रूप से रोमन फाण्ट का उपयोग  करें. रोमन फ़ॉण्ट में टिप्पणियाँ करना एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.
  9. रचनाओं को लेफ़्ट अलाइंड रखते हुए नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें. अन्यथा आगे संकलन के क्रम में संग्रहकर्ता को बहुत ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम 

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Replies to This Discussion

स्वागतम् 

सादर अभिवादन

दोहा छंद

++++++++++++

वार्ता निष्फल  शांति की, जारी है फिर युद्ध।

कमी तेल औ’ गैस की, राहें सब अवरुद्ध॥

चूल्हे के दिन आ गये, वहीं धधकती आग।

मजा दे रही रोटियाँ, दाल भात औ' साग॥

फूँक रही है नव वधू, भरे अश्रु से नैन।

हर कमरे में है धुँआ, सास बहुत बेचैन॥

कंडे लकड़ी की कमी, मिलना है दुश्वार॥

क्या हो विकल्प गैस की, इस पर करें विचार॥

गमलों में अब पेड़ हैं, पौधों के हैं हाट।

लाखों घर बनते गए, वन उपवन सब काट॥

मांग दुपहिया की बढ़ी, कम दिखती है कार।

कमी न हो पेट्रोल की,  चिंतित है सरकार॥

सबका प्रिय साइकिल है, बच्चे वृद्ध जवान।

नित्य चलाते वो रहे, स्वस्थ सदा इंसान॥

++++++++++++

मौलिक अप्रकाशित

 

क्या हो विकल्प गैस का   [ पढ़िए ] 

दोहा छंद
********
आग बुझाने पेट की, जूझ रहा दिन-रात
बुरे किये  हैं  युद्ध ने, गैस  बिना हालात।।
*
लकड़ी ढोता आग को, पहुँचा हर घर गैस
हाल   बिगाड़े   युद्ध  से,  पूँजीवादी  तैस।।
*
सबको प्यारी साइकिल, ढोने को हर भार
ईधन की मजबूरियाँ, उस पर हुआ सवार।।
*
लकड़ी, उपले जन कहें, मत करना उपयोग
लेकिन किल्लत गैस की, बन बैठी है रोग।।

*
पका न पाती  रोटियाँ, भले  युद्ध की आग
जला रही है नित्य पर, वह निर्धन का भाग।।

*
युद्ध, गरीबी, गैस सब, बने नये हथियार
सत्ता के इस खेल में, जनता हुई शिकार।।
*
युद्धों का परिणाम ये, खाली हर भंडार,
चूल्हा ठंडा गैस बिन, रोता हर परिवार।
*
युद्ध बढ़ा तो घट गई, जीवन की रफ्तार
किल्लत देखो गैस की, दे निर्धन को मार।।
*
खेल  रचाता  नित्य ही, बेढब  पूँजीवाद
फँसकर उसके व्यूह में, है जनता बर्बाद।।
*
अब रोटी की आस में, तरसे हर परिवार।
बढ़े गैस के दाम से, बेदम खुद सरकार।।
*
मौलिक/अप्रकाशित

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