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jyotsna Kapil
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teacher n writer
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M.A,(prev.Eng.lit.),reading literature n writing poems,short stories,story,novel.listening melodious music,singing.

Jyotsna Kapil's Blog

सर्द साँझ ( लघुकथा )

बेचैनी उसकी आँखों से साफ नज़र आ रही थी।उधर अमन कश्मकश भरी निगाह से कभी डॉक्टर, कभी बच्चे, तो कभी अपनी पत्नी कली को देखे जा रहे थे।

सर्दी अपने शबाब पर थी।साँझ के धुंधलके में वे दोनों खरीदारी करके लौट रहे थे तो घर के आगे भीड़ देखकर रुक गए।झाड़ियों के पास नर्म, मुलायम कम्बल से लिपटा एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था।लोग अनर्गल प्रलाप में लगे थे पर उसे किसी ने हाथ भी न लगाया था।

" चलो,न जाने किसका पाप है " अमन ने उसकी बाँह सख्ती से पकड़ते हुए कहा।कली ने कुछ कहना चाहा पर पति के चेहरे पर कठोरता के भाव… Continue

Posted on December 16, 2015 at 12:32pm — 4 Comments

मुफ़्त शिविर

बिटिया के छोटे-छोटे बच्चे,दो वक़्त की रोटी जुटाने की मशक्कत,और बेटी की जान पर मंडराता खतरा देखकर परमेसर सिहर उठा।उसने अपनी एक किडनी देकर उसके जीवन को बचाने का संकल्प कर लिया।

" तुम तो पहले ही अपनी एक किडनी निकलवा चुके हो,तो अब क्या मजाक करने आये थे यहाँ ?" डॉक्टर ने रुष्ट होकर कहा।

" जे का बोल रै हैं डागदर साब,हम भला काहे अपनी किटनी निकलवाएंगे।

ऊ तो हमार बिटिया की जान पर बन आई है।छोटे-2 लरिका हैं ऊ के सो हमन नै सोची की एक उका दे दै।"

" पर तुम्हारी तो अब एक ही किडनी है,और ये… Continue

Posted on December 4, 2015 at 2:18pm — 19 Comments

फासले

द्वार खोला तो महीनों बाद अमित को सामने पाकर वह चौंक उठी।

" आप ?"

" हाँ मैं, सोनिया को छोड़ आया हूँ। अब तुम्हारी कीमत का अहसास हो गया है मुझे ,सॉरी मेघा, अब घर लौट आया हूँ, प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे "

" बेशक कर दूँगी ,पर एक बात का ईमानदारी से जवाब दीजिये ,अगर मैं आपको छोड़कर किसी और के पास चली गई होती,तो क्या मुझे सहर्ष स्वीकार कर लेते ? "

उसने असमंजस में मेघा की ओर देखा फिर दृष्टि झुकाते हुए बोला

" नहीं "

वेदना व हिकारत के मिले जुले भाव से पति के झुके हुए चेहरे को उसने… Continue

Posted on December 1, 2015 at 12:43pm — 12 Comments

विडम्बना ( लघुकथा )

बाल श्रम उन्मूलन सप्ताह की कवरेज करके सहकर्मी राकेश के संग लौट रहा सुमित उमंग और जोश से लबरेज़ था।

" सरकार के इस कदम की जितनी प्रशंसा की जाए कम है । कम से कम भोले भाले मासूमों का बचपन तो न छीन पाएगा कोई अब। "

एक झोपड़ पट्टी के पास से गुज़रते हुए जमा भीड़ और एक फटेहाल स्त्री का उच्च स्वर में रुदन सुनकर वह रुक गया

" आग लग जावे इस सरकार को,

अच्छा भला मेरा मुन्ना काम करके चार पैसा कमा लेवे था।पन सज़ा के डर से काउ ने बाए काम पर न रखो।का करता बेचारा ?पेट की आग बुझावे की खातिर चोरी कर… Continue

Posted on November 3, 2015 at 7:25pm — 8 Comments

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