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विडम्बना ( लघुकथा )

बाल श्रम उन्मूलन सप्ताह की कवरेज करके सहकर्मी राकेश के संग लौट रहा सुमित उमंग और जोश से लबरेज़ था।
" सरकार के इस कदम की जितनी प्रशंसा की जाए कम है । कम से कम भोले भाले मासूमों का बचपन तो न छीन पाएगा कोई अब। "
एक झोपड़ पट्टी के पास से गुज़रते हुए जमा भीड़ और एक फटेहाल स्त्री का उच्च स्वर में रुदन सुनकर वह रुक गया
" आग लग जावे इस सरकार को,
अच्छा भला मेरा मुन्ना काम करके चार पैसा कमा लेवे था।पन सज़ा के डर से काउ ने बाए काम पर न रखो।का करता बेचारा ?पेट की आग बुझावे की खातिर चोरी कर बैठा,और कम्बखत पुलिस पकड़कर लै गई।अरे जब काम ही न मिले तो कोई चोरी न करे तो का करे ? " कुछ पल पहले उन बाल श्रमिकों के लिए आर्द्र होता सुमित अब धड़ाधड़ भीड़ और उस महिला की फोटो खींचे जा रहा था।कल के समाचारपत्र के लिए एक नई खबर मिल चुकी थी।
( मौलिक एवम् अप्रकाशित )

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Comment by rajesh kumari on November 5, 2015 at 8:00pm

ज्योत्स्ना जी, आपकी ये लघु कथा एक साथ कई पहलुओं को समेटे  हुए है एक और जहाँ बाल श्रम पर केन्द्रित है वहीँ सरकार की बिना आगे की सोचे या क़ानून से पहले उस समस्या का निदान सोचने से पहले ही कदम उठाना सरकार के गलत कदम की और इशारा करती है 

तीसरे मीडिया को तो हर हाल में अपना काम करना है इन तीन पहलुओं पर एक सफल लघु कथा हुई दिल से बहुत बहुत बधाई आपको |

Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 8:18pm

सार्थक और सटीक, वधाई आदरणीया ज्योत्सना जी!

Comment by TEJ VEER SINGH on November 4, 2015 at 5:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय ज्योत्सना जी!अच्छी लघुकथा!

Comment by kanta roy on November 4, 2015 at 12:02pm

सिर्फ एक धांसू खबर के लिए लालायित मानसिकता का बहुत खूब चित्रण हुआ है। एक सार्थक संपन्न लघुकथा के लिए बधाई ज्योत्सना। बहुत खूब लेखन हुआ है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 4, 2015 at 11:34am

आदरणीया ज्योत्स्ना जी बहुत बढ़िया लघुकथा हुई है. हार्दिक बधाई. आदरणीय डॉ विजय शंकर सर से सार्थक टीप पाने के लिए विशेष बधाई. सर ने वाकई कथा के मर्म को बारीकी से पकड़ा है.// हमारे पास बच्चों के लिए कोई विचार / योजना है ही नहीं , नकारात्मक क़ानून बहुत हैं।// सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 4, 2015 at 9:04am
मैं Dr Vijai Shanker जी व आदरणीया Rahila जी की टिप्पणियों से पूरी तरह सहमत हूँ। पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि हर भलाई में बुराई और हर बुराई में कहीं न कहीं एक अच्छाई भी निहित होती है। अधिक प्रतिशत वाली उपलब्धि पर संतोष करने में ही भलाई है इस भारतीय व्यवस्था में। बहुत अच्छा सच्चा चित्रण किया है आपने आदरणीया Jyotsana Kapil जी। हृदयतल से बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको।
Comment by Dr. Vijai Shanker on November 3, 2015 at 10:58pm
आदरणीय सुश्री ज्योत्स्ना कपिल जी , कभी-कभी तो वाकई में लगता है कि न तो हम अपनी समस्याओं को समझ पाते हैं , न उनका सही निदान ढूंढ पाते हैं और प्रायः कोई उलटा - सीधा समाधान निकालते भी हैं तो कितनी ही नई समस्याएं उत्पन्न कर लेते हैं। हमारे पास बच्चों के लिए कोई विचार / योजना है ही नहीं , नकारात्मक क़ानून बहुत हैं। आपको इस विचार - पूर्ण रचना के लिए बधाई , सादर।
Comment by Rahila on November 3, 2015 at 8:47pm
बहुत बेहतरीन रचना आदरणीया ज्योत्सना जी!हर सिक्के के दो पहलू होते है और दोनों ही वजूद में होते है, आपकी रचना की तरह । बहुत बधाई आपको इस उम्दा लेखन के लिये ।

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