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द्वार खोला तो महीनों बाद अमित को सामने पाकर वह चौंक उठी।
" आप ?"
" हाँ मैं, सोनिया को छोड़ आया हूँ। अब तुम्हारी कीमत का अहसास हो गया है मुझे ,सॉरी मेघा, अब घर लौट आया हूँ, प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे "
" बेशक कर दूँगी ,पर एक बात का ईमानदारी से जवाब दीजिये ,अगर मैं आपको छोड़कर किसी और के पास चली गई होती,तो क्या मुझे सहर्ष स्वीकार कर लेते ? "
उसने असमंजस में मेघा की ओर देखा फिर दृष्टि झुकाते हुए बोला
" नहीं "
वेदना व हिकारत के मिले जुले भाव से पति के झुके हुए चेहरे को उसने देखा और द्वार बन्द कर लिया।

( मौलिक एवम अप्रकाशित )

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Comment by jyotsna Kapil on December 4, 2015 at 7:53am
आदरणीय प्रतिभा पांडे जी रचना पर आपकी उपस्थिति व सुखद प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार।
Comment by pratibha pande on December 3, 2015 at 11:52am

  स्त्री की क्षमाशीलता और सहनशीलता की भी एक सीमा है , आपकी रचना की नायिका ने ये बात बड़े ही दमदार तरीके से बता दी है , हार्दिक बधाई इस सशक्त रचना पर आदरणीया  ज्योत्स्ना जी  

Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:26am
आदरणीय सुशिल सरना जी आपकी सहृदय प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार।
Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:25am
आदरणीय नीता कसर दी आपकी प्रेरक टिप्पणी हेतु अन्तस् से आभारी हूँ।
Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:24am
आदरणीय नादिर खान जी रचना की सराहना करके मेरी हौसला अफ़ज़ाई करने के लिए आपकी बाहय शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:23am
आदरणीय तेजवीर सिंह जी आपने रचना को समय दिया व सराहा भी इस हेतु आपकी अति आभारी हूँ।
Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:21am
आदरणीय शेख उस्मानी भाई आपकी प्रेरणादायक टिप्पणी के लिए हृदयतल से आभारी हूँ।
Comment by Sushil Sarna on December 1, 2015 at 7:54pm

आदरणीया ज्योत्स्ना जी वर्तमान में घटित हो रही पारस्परिक संबंधों को बहुत ही संजीदगी से प्रस्तुत किया है। इस सार्थक और संदेशप्रद लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by Nita Kasar on December 1, 2015 at 6:55pm
जीवन में आये फ़ासले ख़त्म करने के लिये बड़ी कुशलता ईमानदारी की ज़रूरत होती है अपने अहं को दरकिनार रख कर सामंजस्य के साथ रिश्ते लंबी दूरी तय करने का साहस रखते है वरना यही परिणाम सामने आता है ।संवेदनशील कथा के लिये बधाई आद०जयोत्सना जी
Comment by नादिर ख़ान on December 1, 2015 at 6:21pm

आदरनीय ज्योत्सना जी दिल को छूती उत्तम रचना के लिये बधाई ..... 

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