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सर्द साँझ ( लघुकथा )

बेचैनी उसकी आँखों से साफ नज़र आ रही थी।उधर अमन कश्मकश भरी निगाह से कभी डॉक्टर, कभी बच्चे, तो कभी अपनी पत्नी कली को देखे जा रहे थे।
सर्दी अपने शबाब पर थी।साँझ के धुंधलके में वे दोनों खरीदारी करके लौट रहे थे तो घर के आगे भीड़ देखकर रुक गए।झाड़ियों के पास नर्म, मुलायम कम्बल से लिपटा एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था।लोग अनर्गल प्रलाप में लगे थे पर उसे किसी ने हाथ भी न लगाया था।
" चलो,न जाने किसका पाप है " अमन ने उसकी बाँह सख्ती से पकड़ते हुए कहा।कली ने कुछ कहना चाहा पर पति के चेहरे पर कठोरता के भाव देखकर चुपचाप चल दी।।
घर आकर एक पल को भी उसके दिमाग से शिशु का चेहरा न गया।जब काफ़ी देर तक वह मानसिक अंतर्द्वन्द से छुटकारा न पा सकी तो उठ खड़ी हुई।शीघ्रता से जाकर शिशु को उठाया और कलेजे से लगा लिया।उसकी श्वास बहुत हल्की चल रही थी और कोमल गात निश्चेष्ट था।
" अब ये खतरे से बाहर है " डॉक्टर का स्वर सुनकर जैसे वह जाग पड़ी।
" थैंक गॉड,अगर इसे कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी न माफ़ कर पाती " भावावेश से कली रो पड़ी।
" अब ?" अमन ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसे देखा।
" मैं उसे यूं मरने नहीं दे सकती अमन,मैं पालूँगी इसे "
( मौलिक एवम अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2015 at 7:05pm

कथा अच्छी है किन्तु  आदर्शवादी है .यथार्थ में ऐसा  होना कम संभव है . कथा के इए साधुवाद .

Comment by Shyam Narain Verma on December 17, 2015 at 5:37pm
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई
Comment by Rahila on December 17, 2015 at 11:20am
ममता का कोई मुकाबला ही नहीं । बेहद सुन्दर भावों में लिपटी शानदार रचना आदरणीया दी! सादर
Comment by Nita Kasar on December 16, 2015 at 9:12pm
ममता से ओतप्रोत माँ का मन पिघल जाताहै मोम की तरह ममता वह उस समय एकतरफ़ा निर्णय का एलान करती है संवेदनाओं से लबरेज़ कथा के लिये बधाई स्वीकार करियेगा आद०जयोत्सना कपिल जी ।

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