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विशाल सागर ......
सागर
तेरी वीचियों पर मैं
अपनी यादों को छोड़ आया हूँ
तेरे रेतीले किनारों पर
अपनी मोहब्बत छोड़ आया हूँ
तेरी लहरों पर
नृत्य करती चांदनी संग
अपने सपन छोड़ आया हूँ
अपनी ज़िद,अपने सारे
भरम छोड़ आया हूँ
बस साथ अपने
अपना आसमान लाया हूँ
कुछ सुलगते अरमान
कुछ स्पर्शों के तूफ़ान
कुछ भीगी कागज़ की कश्तियाँ
कुछ अबोली खामोशियाँ
साथ अपने लाया हूँ
बाकी सब
तेरे किनारों पर छोड़ आया हूँ
वो आये कभी
मेरे बाद तो
मेरा सामान उसे लौटा देना
और हाँ
तेरी लहरों को
मैं भी एक बूँद
अपने खारे सागर की
जो देकर आया था
वो भी उसे लौटा देना
एक दर्द को आराम मिल जाएगा
तेरी मेहरबानी से
आशिक को उसका
मुक़ाम मिल जाएगा
फिर तू सच्चे मायने में
एक विशाल सागर कहलायेगा
 
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 19, 2019 at 7:02pm

आदरणीय आशीष यादव जी, आदाब ... सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 19, 2019 at 7:02pm

आदरणीय Vijay Nikore जी,  सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 19, 2019 at 7:01pm

आदरणीय समर कबीर जी, आदाब ... सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by vijay nikore on December 15, 2019 at 7:43pm

अच्छी रचना बनी है। हार्दिक बधाई, मित्र सुशील जी।

Comment by आशीष यादव on December 15, 2019 at 6:24pm

अच्छी कविता पर बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by Samar kabeer on December 13, 2019 at 2:55pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करे ।

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