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नदिया  पोखर सब सूखे - गजल ( लक्ष्मण धामी " मुसाफिर"

२२२२ २२२२ २२२२ २२२


पोथा पढ़ना पंडित  भूले  शुभ मंगल  में आग लगी
जो माथे को शीतल करता उस संदल में आग लगी।१।


जहर  भरा  है  खूब हवा  में  हर मौसम दमघोटू  है
पंछी अब क्या घर लौटेंगे जिस जंगल में आग लगी।२।


कैसी  नफरत  फैल  गयी  है  बस्ती  बस्ती  देखो तो
जिसकी छाँव तले सब खेले उस पीपल में आग लगी।३।


धन दौलत  की  यार पिपासा  इच्छाओं का कत्ल करे
चढ़ते यौवन जिसकी चाहत उस आँचल में आग लगी।४।


किस्मत फूटी है हलधर की नदिया  पोखर सब सूखे
कब देता है पानी जग को जिस बादल में आग लगी।५।


मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on June 7, 2018 at 10:56am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी।लाज़वाब गज़ल।

कैसी  नफरत  फैल  गयी  है  बस्ती  बस्ती  देखो तो 
जिसकी छाँव तले सब खेले उस पीपल में आग लगी।३।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 7, 2018 at 10:34am

आ. भाई भाई बसंत जी, गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2018 at 10:06am

वाह वाह वाह लाजबाब गजल हुई है आदरणीय , बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2018 at 11:07pm

आ. रक्षिता जी, प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2018 at 11:06pm

आ. भाई महेंद्र कुमार जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद । मिसरा आपकी सलाहानुसार भी हो सकता है आभार ।

Comment by रक्षिता सिंह on June 6, 2018 at 8:47pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, आधुनिक  युग को दर्शाती  बहुत ही  बेहतरीन  पंक्तियाँ ....

दिलीमुबारकबाद  क़ुबूल करें।

Comment by Mahendra Kumar on June 6, 2018 at 7:53pm

शानदार ग़ज़ल है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी. बहुत ही अच्छा काफ़िया लिया है आपने और ख़ूबसूरती से निभाया भी है. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. 

//पंछी अब क्या घर लौटेंगे जिस जंगल में आग लगी।// क्या यह मिसरा इस तरह हो सकता है : "पंछी अब क्या घर लौटेंगे जब जंगल में आग लगी।"

सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2018 at 7:40pm

आ. भाई श्यामनारायन जी, गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 6, 2018 at 5:34pm
वाह बेहद खूबसूरत प्रस्तुति … हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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