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मैं सजनी उसकी हो गयी .....

मैं सजनी उसकी हो गयी .....

निष्पंद देह में
जाने कैसे

सिहरन सी हो गई


सानिध्य में लिप्त श्वासें
अबोध स्पर्शों की
सहचरी हो गयीं


बर्फ़ीले आलिंगन
मासूम समर्पण से
चरम की ओर
बढ़ने लगे


तृप्ति की
अतृप्ति से होड़ हो गई


शोर थम गया
सभी प्रश्न
अपने चिन्हों के घरोंदों में
सो गए


लक्ष्य
स्वप्न मग्न हो गए


असंभव
संभव हो गया
भाव वेग
तरल हो गए


लजीले नयन
सजल हो
प्रपात बन
बह निकले


पल को
सदियाँ मिल गयीं
एक पल
जीवन हो गया


मैं

आसक्ति के
उस पल में
अधर घटों पर
खो गयी
वो

साजन मेरा हो गया
मैं

सजनी उसकी हो गयी


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 19, 2018 at 12:22pm

आदरणीय बृजेश जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on April 19, 2018 at 12:21pm

आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 18, 2018 at 8:21pm

वाह बहुत सुन्दर रचना आदरणीय...

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2018 at 4:31pm

आदरणीय सुशील जी इस उम्दा रचना पर हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Sushil Sarna on April 17, 2018 at 6:46pm

आदरणीय समर कबीर साहिब,आदाब , सृजन को अपनी स्नेहाशीष से उपकृत करने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 12:05pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा रचना हुई है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on April 16, 2018 at 8:27pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 16, 2018 at 6:58pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी। तन और मन को तरंगित करने वाली बेहतरीन रचना।

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