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कुछ कहते-कहते ...

कुछ कहते-कहते ...

विरह निशा के श्यामल कपोलों को चूम
निशब्द प्रीत
अपनी निष्पंद साँसों के साथ
कुछ कहते-कहते
सो गयी

व्यथित हृदय
कब तक बहलता
पल पल
टूटती यादों के खिलौनों से
स्मृति गंध
आहटों के राग की प्रतीक्षा में
नैनों में
वेदना की विपुल जलराशि भरे
पवन से
कुछ कहते-कहते
सो गयी

खामोशियाँ
बोलती रहीं
शृंगार सिसकता रहा
थके लोचन
विफलता के प्रहार
सह न सके
निशा भोर के आलोक में खोने लगी
अंततः
प्रतीक्षा की देहरी पर
अभिसार की तृष्णा लिए
दो बूँदें रक्त की गिर पड़ी
भोर ने
प्रतीक्षारत
रक्त की दो बूंदों से
अपनी मांग भरी
अवसन्न रात्रि का अवसान हुआ
शनैः शनैः
सुधि लौ
तिमिर अंक में
लीन हुई
अतृप्त तृषा
व्यथित मन की
प्रीत वीचि पर
कुछ कहते-कहते
सो गयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 80

Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 11, 2018 at 8:22pm

आदरणीय सुरेन्द्र सिंह जी आपकी भावों को अलंकृत करती प्रतिक्रिया का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 11, 2018 at 8:22pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी स्नेहाशीष का दिल से आभारी है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 6:52am

आ. भाई सुशील जी, विरहवेदना की सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 8, 2018 at 1:26pm

आद0 सुशील सरना जी बेहतरीन कविता, आप की कविता पढ़ते पढ़ते लगता है जैसे खो सा जाता हूँ।बहुत बढ़िया भाव सम्प्रेषण। बधाई आपको।सादर

एक निवेदन है, हम लोग भी कुछ न् कुछ ब्लॉग पर लिखते रहते हैं । अगर आप उनपर भी अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दें, तो हमें भी अच्छा लगेगा। सादर

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2018 at 1:58pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब। .. प्रस्तुति को अपने शीरीं अल्फ़ाज़ों से मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2018 at 1:58pm

आदरणीय मोहित मिश्रा जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2018 at 1:57pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब , आदाब ... प्रस्तुति के भावों को अपनी स्नेहिल प्रतिक्रिया से सुशोभित करने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on January 6, 2018 at 11:38am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता है, इस ओरस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohit mishra (mukt) on January 6, 2018 at 9:25am

आदरणीय शुशील सरना जी , प्रतीक्षारत विरह-व्याकुलता को सटीक शब्दों में ढाला अपने। अच्छी रचना पर बधाई स्वीकार करें

Comment by Mohammed Arif on January 5, 2018 at 9:47pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,

                       बहुत ही सुंदर कविता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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