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बहर - 2122 2122 2122 212

एक तितली का चमन मे आना जाना हो गया .....
देख ..उसको एक गुल यारों दिवाना हो गया ....

उनकी हर तस्वीर मेरे दिल मे धुँधली हो गई
उनको .. देखें दोस्तों जो इक ज़माना हो गया ....

देख मुझको वो मुसलसल मुस्कुराती ही रही
क्या.... सही मेरी निग़ाहों का निशाना हो गया ....

एक बच्चा खा रहा था कूड़े से जूठन , उसे
देखकर ....मेरे लबों से दूर दाना हो गया ..

जी , शहद जितनी मुझे हर पल मिठास आने लगी
अपना रिश्ता लगता है यारों पुराना हो गया .....

मैंने .....तो बस चाह की उनके हसीं दीदार की ,
रुख से उनका उस ही पल पर्दा हटाना हो गया ....

अपने छोटे मुख से जब उसने कहीं बातें बड़ी ,
हर कुई महफ़िल में फिर उसका दिवाना हो गया ....

मैंने .... जब प्रमाण माँगा उनके होने का यहाँ ,
पत्थरों का फिर निग़ाहों को बहाना हो गया .....

मौलिक और अप्रकाशित ...

पंकजोम " प्रेम ".

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Comment by पंकजोम " प्रेम " on November 21, 2017 at 7:14pm
आपके आशिर्वाद का दिल से शुक्रगुज़ार हूँ , आ0 दादा समर कबीर जी .....
Comment by पंकजोम " प्रेम " on November 21, 2017 at 7:14pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ0 दादा आशुतोष जी ...आ0 दादा रामानुज जी .... आ0 दादा मुहम्मद आरिफ जी ....
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 26, 2017 at 4:34pm

आदरणीय पंकजोम जी पहली बार आपकी रचना को पढने का अवसर प्राप्त हुआ आपकी रचना के माध्यम से आदरणीय समर सर और निलेश भाई जी की प्रतिक्रियाओं से बहुत सारी बारीकियाँ सीखने को मिलीं . इस  प्रयास पर हार्दिक बधाई सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 24, 2017 at 11:43am

मुझे बहुत अधिक समझ तो नहीं पर कुछ शेर बह्र एवं मापनी में नजर नहीं आ रहे | एक बार गुणीजनों की टिपण्णी अनुसार पुनह अवलोकन करना उचित होगा | प्रयास के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Mohammed Arif on October 24, 2017 at 8:06am
आदरणीय पंकजोम जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । गुणीजनों की बातों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ उनकी बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Samar kabeer on October 23, 2017 at 9:29pm
जनाब पंक्जोम"प्रेम" जी आदाब,कुछ बातें जनाब निलेश जी ने समझाईं कुछ मैं बताता हूँ ।
'देख मुझको वो मुसलसल मुस्कुराती ही रही'
ग़ज़ल कहते समय ये भी ध्यान रखें कि शाइरी में महबूब को स्त्रीलिंग की तरह नहीं बरता जाता,इस मिसरे को यूँ कीजिये:-
'देख मुझको वो मुसलसल मुस्कुराते ही रहे'

'जी,शहद जितनी मुझे हर पल मिठास आने लगी
अपना रिश्ता लगता है यारों पुराना हो गया'
इस शैर पर बहुत कुछ है कहने के लिये, सबसे पहली बात 'शहद'शब्द का वज़्न आपने 12लिया है,जबकि इसका सही वज़्न है21,दूसरी बात ये कि मिठास आती नहीं बल्कि 'लगती'है,तीसरी बात,इस शैर का भाव् बेतुका है, और दोनों मिसरों में रब्त भी नहीं है,आपको शहद जैसी मिठास आने लगी तो इससे ये कैसे पता चला कि रिश्ता पुराना हो गया है,मेरे ख़याल से इस शैर को हटा देना बहतर होगा ।

'मैंने तो बस चाह की उनके हसीं दीदार की
रुख़ से उनका उस ही पल पर्दा हटाना हो गया'
इस शैर के ऊला मिसरे में 'हसीं'शब्द भर्ती का है, क्योंकि महबूब का दीदार तो हसीं ही होता है,सानी मिसरे में 'उस ही'शब्द भर्ती के हैं,इस शैर को यूँ किया जा सकता है:-
'देखने की तुझको ख़्वाहिश दिल में बस जागी ही थी
और इधर रुख़ से तेरा पर्दा हटाना हो गया'
आख़री शैर के दोनों मिसरों में भी रब्त नहीं है,देखियेगा,बाक़ी शुभ शुभ
Comment by नाथ सोनांचली on October 23, 2017 at 5:49am
आद0 पँकजोम जी सादर अभिवादन, बेहतरीन प्रयास ग़ज़ल का । शेष गुनिजनो कह चुके है। बधाई सादर।
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 23, 2017 at 5:42am
आदरणीय खूबसूरत ग़ज़ल कहने क लिये बधाई।ग़ज़ल में कुछ जाने अनजाने होना स्वाभाविक है। विद्वजन की टिप्पणी पर गौर करना आवश्यक है।ओपेन बुक्स आन लाइन एक पाठशाला है। जहाँ सब इसी तरह सीखते हैं। मैं भी सीखता हूँ।
Comment by पंकजोम " प्रेम " on September 27, 2017 at 10:34am
बहुत बहुत शुक्रिया आ0 दादा नंद किशोर दुबे जी ...... आशिर्वाद बनाएं रखना
Comment by नन्दकिशोर दुबे on September 24, 2017 at 4:40pm
सुन्दर रचना ।

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