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मेरा कच्चा मकान क्या करता (ग़ज़ल 'राज')

२१२२  १२१२    २२

बात खाली मकान क्या करता

दास्ताँ वो बयान क्या करता 

 

पंख कमजोर हो गये मेरे  

लेके अब  आसमान क्या करता 

उसकी  सीरत ने छीन ली सूरत

उसपे सिंघारदान क्या करता 

 

रूठ जाते मेरे सभी अपने

चढ़के ऊँचे मचान क्या करता

 

नींव में झूठ की लगी दीमक 

लेके ऐसी दुकान क्या करता

 

बाढ़ में ढह गये महल कितने    

मेरा कच्चा मकान क्या करता

 

मौन सब थे निजाम की सुनकर

मैं चलाकर  जुबान क्या करता

 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 6:48pm

बाढ़ में ढह गये महल कितने, मेरा कच्चा मकान क्या करता..वाह ! बहुत ही खूबसूरत रचना है आदरणीया rajesh kumari जी , हार्दिक बधाई आपको ! सादर 


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Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 6:47pm

आदरणीय सुशील सरना जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 16, 2017 at 6:03pm
मुहतर्मा राजेश कुमारी साहिबा,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 4:18pm

बड़ी प्यारी ग़ज़ल हुई है आदरणीय राजेश दी हार्दिक बधाई आपको |

Comment by narendrasinh chauhan on July 13, 2017 at 6:07pm

खूब सुन्दर रचना  के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by khursheed khairadi on July 13, 2017 at 7:28am
खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीया राजेश कुमारी जी । दिली मुबारक़बाद। सादर।
Comment by नाथ सोनांचली on July 12, 2017 at 10:19pm
बहन राजेश कुमारी जी आदाब,वाह वाह बहुत ख़ूब, क्या शानदार ग़ज़ल कही आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 8:19pm

पंख कमजोर हो गये मेरे  

लेके अब  आसमान क्या करता ...वाह!

रूठ जाते मेरे सभी अपने

चढ़के ऊँचे मचान क्या करता ...बहुत ख़ूब!

इस शानदार ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आ. राजेश मैम. सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 11, 2017 at 8:53pm

दीदी इस गजल में आप छा गईं . सादर.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 11, 2017 at 6:51pm
वाह वाह आदरणीया बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई...सादर

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