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चिर-दिनों तक तुम हो मेरी

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी,
युगों युगों तक रहूँ तुम्हारा|
इक दूजे से अलग नही हम,
जनम-जनम तक साथ हमारा|

जितनी मर्जी उतना रुठो,
जितना मन हो रहो बेखबर,
तुम्हे मनाऊँ चिर-जीवन तक,
बिछड़न तुमसे नही गँवारा|

आस मेरी तुम साँस मेरी तुम,
तुम ही मेरे दिल की धड़कन,
अब तो सबकुछ तुम ही मेरी,
नजरों को बस तुम्ही नजारा|

तुमको चाहूँ तुम्हे सराहूँ,
तेरे ही बारे मे सोचूँ,
उस जीवन को भूल गया हूँ,
जो कुछ तेरे बिना गुजारा|

"मौलिक और अप्रकाशित"

आशीष यादव

Views: 660

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Comment by आशीष यादव on September 12, 2020 at 5:18am

आदरणीया प्रतिभा पांडे जी रचना पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by आशीष यादव on September 12, 2020 at 5:18am

आदरणीय श्री सुशील सरना सर रचना पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by आशीष यादव on September 12, 2020 at 5:17am

आदरणीय श्री समर कबीर साहब रचना पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by Samar kabeer on June 3, 2016 at 2:48pm
जनाब आशीष यादव जी आदाब,इस सुंदर भावपूर्ण रचना के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on June 2, 2016 at 4:18pm

भाव पूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय। 

Comment by pratibha pande on June 2, 2016 at 12:08pm

सुन्दर  सहज  भाव ,   अच्छी रचना के लिए बधाई प्रेषित है आदरणीय आशीष यादव जी 

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