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एक दिन आऊँगा मिलनें, प्रलय बनकर के मनुज।।- पर्यावरण की चेतावनी पंकज की लेखनी से

मैं धरा पर्यावरण कुछ कह रहा तुमसे मनुज।
धरा है माता तुम्हारी मैं पिता सुन ले मनुज।।

धरा का मातृत्व मुझसे, आभरण धरती का मैं।
धरा है तब तक सुहागन, सकुशल जब तक हूँ मैं।।

मैंने तुझको तन दिया, शाक का भोजन दिया।
जन्तु सह-जीवन दिया, और खनिज संसाधन दिया।।

मृदा-अग्नि-जल-पवन, निर्मित है तन मेरा मनुज।
अंश तू मेरा ही है, किया धरा नें धारण मनुज।।

तूने मेरे विविध अंगों का अतिशोषण किया।
क्या बताऊँ तूने मुझमें, कितना परिवर्तन किया।।

तन का हर एक घाव अब, तुझको दिखाने को मनुज।
हृदय व्याकुल है बहुत, आतुर है मिलने को मनुज।।

कैटरीना डैमरे और सुनामी रूप में।
आऊँगा मिलने तुझे मैं अब अनेकों रूप में।।

आदतें अपनी बदल ले अन्यथा सुन ए मनुज।
एक दिन आऊँगा मिलनें, मैं प्रलय बन के मनुज।।

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 6:19am

काश ! मनुष्य यह सब समझ पाता ....

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 18, 2016 at 10:26pm
आदरणीय राम आसरे सर सादर धन्यवाद
Comment by Ram Ashery on January 18, 2016 at 3:27pm

बहुत ही उत्तम रचना आपको बहुत बहुत बधाई हो 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 18, 2016 at 9:59am
आदरणीय तेजवीर सर सादर प्रणाम, आशीर्वाद प्रदान करनें के लिए आभार- सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on January 18, 2016 at 9:57am

हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज कुमार जी!बहुत शानदार प्रस्तुति! 

कृपया ध्यान दे...

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