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"सुनो! आजकल न्यूज चैनल पर अदालती कार्यवाही की खबर सुनकर, यूँ लगता है कि क़ानून तेज और सबसे ऊपर है"

"हाँ! बिलकुल सही कह रही हो. यार!  रिमोर्ट कहाँ है..? थोड़ा वाल्यूम कम करना, वकील साहब का फोन आ रहा है "

"नमस्ते वकील साहब! कहाँ तक पहुंचा मामला..? अगली तारीख कब है..? "

"उन लोगों ने कहीं से कुछ साक्ष्य प्रस्तुत किये है हम कमजोर पड़ सकते हैं. और अगली तारीख इसी माह है..?

"इसी माह्ह्ह.. वकील साहब! इतनी गर्मी पड़ रही है. मेरा परिवार के साथ सैर-सपाटे पर जाने का प्लान है. आप ऐसा कीजिये न. पिछली बार की तरह डॉक्टर से मिलकर... बाकि फिर साहब ,  आप तो न्याय के मन्दिर के पुजारी ठहरे.."

जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 14, 2015 at 3:10am

आदरणीय मिथिलेश जी.

आपकी प्रोत्साहित करती सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 14, 2015 at 3:09am

आदरणीय सौरभ जी, सादर नमन

लघुकथा पर आपकी सकारात्मक स्वीकारोक्ति मन में सुखद संतोष भर देती है. आपका ह्रदय से आभारी हूँ.

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2015 at 1:28am

बहुत खूब ! प्रस्तुति पर क्या पकड़ बनी है आपकी भाईजी.

हार्दिक शुभकामनाएँ इस सफल प्रसतुति पर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 1:54am

आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया  जी इस सफल लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई 

न्यायपालिका को मज़ाक बनाए बैठे लोगो पर करारा व्यंग्य 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 14, 2015 at 9:26am

लघुकथा पर ,आप सभी की उपस्थिति व् प्रोत्साहन के लिए आप सभी का ह्रदय से आभारी हूँ, आदरणीय शुभ्रांशु जी, आदरणीय डा.आशुतोष जी, आदरणीय वीरेन्द्र मेहता जी, आदरणीय कृष्णा जी. स्नेह बनाए रखियेगा

सादर!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 13, 2015 at 10:06pm

बेहतरीन लघुकथा पर बधाई भाई जितेन्द्र जी!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 10, 2015 at 3:57pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी.. आजकल बिलकुल ऐसा ही हो रहा है ..न्याय और न्यायलय तो जैसे मजाक हो गए हैं ..इस सुंदर चिंतन पर आपको तहे दिल बधाई सादर 

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 3:26pm

आदरणीय जितेन्द्र जी, 

अदालतों के कार्यवायी की महीनीं को आपने सुन्दर ढंग से प्र्स्तुत किया है.

सादर.

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 10, 2015 at 10:25am

एक सार्थक कथा !  सादर बधाई स्वीकार करे.

नया प्रणाली में सुधार की इच्छा खुद को बदले बिना बे मानी ही है 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 9, 2015 at 1:02am

लघुकथा पर आपके विचार से लेखनकर्म को संतोष मिलता है आदरणीया राजेश दीदी. आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

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