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ग़ज़ल :-एक चहरे में दूसरा क्या है

बह्र :- फ़ाईलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

आईनागर ज़रा बता क्या है
एक चहरे में दूसरा क्या है

आग गुलज़ार कैसे बनती है
देखना है तो सोचता क्या है

किस लिये हम से पूछता है नदीम
तू नहीं जानता,हुवा क्या है

क्या छुपा कर रखा है सीने में
और होटों से बोलता क्या है

दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ में धरा क्या है

आईने की तरह चमकती है
हम बताऐं तुम्हें वफ़ा क्या है

दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है

मैं हूँ दीवाना और तू हुश्यार
मुझ से तेरा मुक़ाबला क्या है

ख़ुद को "ग़ालिब" समझ रहा है "समर"
"या इलाही ये माजरा क्या है"

"समर कबीर"
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Samar kabeer on April 21, 2015 at 6:48pm
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हैसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by shree suneel on April 21, 2015 at 4:47pm
आदरणीय समर कबीर सर, इस शानदार, भरी-पूरी ग़ज़ल के लिए दिल से दाद.
आग गुलज़ार कैसे बनती है
देखना है तो सोचता क्या है

मैं हूँ दीवाना और तू हुश्यार
मुझ से तेरा मुक़ाबला क्या है

दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ में धरा क्या है
बहुत ख़ूब सर. बधाईयाँ.. बधाईयाँ
Comment by Samar kabeer on April 21, 2015 at 10:45am
जनाब "जान" गोरखपुरी साहिब,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हैसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 21, 2015 at 10:41am
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत हो गई,ग़ज़ल का मान बढ़ गया,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2015 at 11:53pm

और बाक़ी दो ?...
विद्या ददाति विनयम 

Comment by Samar kabeer on April 20, 2015 at 10:51pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,मैंने लिखा था कि अशआर एसे ही रहने दूँ या तब्दील करें,आपने तो मुझे मिसरे भी सुझा दिये,मेरे भाई यह काम तो मैं ख़द भी बख़ूबी कर सकता हूँ,मजबूरी यह है भाई जैसा कि आपने ख़ुद लिखा है कि ये दोष बड़े बड़े शाईरों के यहाँ पाया जाता है,इसका मतलब यह हुवा कि इस दोष को मन्यता प्राप्त है,मैंने अपने पिछले कमेंट में लिखा था कि मैंने यह ग़ज़ल ग़ौर करने के बाद पोस्ट की है,यह सच है,अगर इस ग़ज़ल को दोष मुक्त करने से इसकी रवानी में बड़ा फ़र्क़ पड़ेगा ,इसलिये मेरे भाई इस ग़ज़ल को ज्यूँ का त्यूँ ही रहने देते हैं,मेरी आप से दरख़्वास्त है कि इस ग़ज़ल को पुन: पढ़ें और इसका लुत्फ़ लें |

"आग गुलज़ार कैसे बनती है ?
देखना है तो सोचता क्या है"

इस शैर में "तलमीह" है,इसे अगर दोष मुक्त कर देंगे तो तलमीह का मज़ा ही ख़त्म हो जाएगा |
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 9:10pm

दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है  वाह! वाह!

मैं हूँ दीवाना और तू हुश्यार
मुझ से तेरा मुक़ाबला क्या है   लाजवाब शेर!

बहुत बहुत बधाई आ० समर सरजी!

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 20, 2015 at 7:04pm
और होटों से बोलता क्या है ॥
दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ में धरा क्या है ॥
आईने की तरह चमकती है
हम बताऐं तुम्हें वफ़ा क्या है ॥
दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है ॥
वाह ! आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार, एक एक शेर लाजवाब है , बहुत बहुत मुबारकबाद आपको. सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2015 at 6:56pm

यदि शेर का भाव बदले बिना बदलाव संभव हो तो प्रयास करें..... कुछ सुझाव हैं 
आग गुलज़ार कैसे बनती है___ कैसे शोला बदन हुआ गुलज़ार 
दिल को छू जाए तो ये जादू है___ दिल में उतरे तो ये लगे जादू .
आईने की तरह चमकती है___ये चमकती है आईने की तरह.
 
 

Comment by Samar kabeer on April 20, 2015 at 6:33pm
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ|

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