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आसमां को भी कभी सर पर उठाकर देखिये : ग़ज़ल : हरि प्रकाश दुबे

2122--2122--2122--212

इक यही सूरत बची है आज़्मा कर देखिये

दोस्ती अब दुश्मनों से भी निभाकर कर देखिये

 

आँख से रंगीन चश्में को हटाकर देखिये

जिंदगी के रंग थोड़ा पास आकर देखिये

 

रोज खुश रहने में दिल को लुत्फ़ मिलता है मगर

जायका बदले ज़रा सा ग़म भी खाकर देखिये

 

कल बड़ी मासूमियत से आईने ने ये  कहा

हो सके तो आज मुझको मुस्कराकर देखिये

 

छोड़ कर इन ख़ामोशियों को चार दिन तन्हाँ कहीं

आसमां को भी कभी सर पर उठाकर देखिये

 

ख़ुशबुओं के काफिले जायेंगे खुद ही दूर तक

इक जरा सा आप फूलों को हसाँकर देखिये

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:52pm

आ० हरी प्रकाश जी

बहुत सुन्दर .  मजा आ गया . बहुत जम कर लिखा आपने .

Comment by Shyam Narain Verma on March 16, 2015 at 2:52pm
बहुत उम्दा ... बहुत बहुत बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 16, 2015 at 12:11pm
वाह वाह आदरणीय हरिप्रकाश भाई जी ग़ज़ल सुन्दर हुई है हार्दिक बधाई। बह्र को साधने के लिए विशेष बधाई। आपने बह्र को खूब निभाया है है। पांचवे शेर के मिसरा-ए-उला को देख लीजियेगा। सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 16, 2015 at 11:31am
कल बड़ी मासूमियत से आईने ने ये कहा
हो सके तो आज मुझको मुस्कराकर देखिये
क्या बात है, बहुत सुन्दर , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , बधाई, सादर।
Comment by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 11:23am

Aadarniya Hari Prakash dubey Ji,

Kya kahne ...Kya Kahne.. Anand aa gaya. Jindangi hansne kaa hi naam hai. Dhil se dheron badhai.

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2015 at 11:09am
खूबसूरत अश’आर हुए हैं हरिप्रकाश जी, ये शे’र बहुत अच्छा हुआ है।

कल बड़ी मासूमियत से आईने ने ये कहा
हो सके तो आज मुझको मुस्कराकर देखिये

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