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" हँसकर पतवार चलाना रे "

सुख-दुःख तो आते जाते हैं................................... 

सुख-दुःख तो आते जाते हैं,  राही मत घबरा जाना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

 

हमने कुछ देखी रीत यहाँ,..................................

हमने कुछ देखी रीत यहाँ, श्रम से ही सब कुछ मिलता है !

ईमान –धरम के काँटों में, तब फूल मुकद्दर खिलता है !

 

दौलत तो आनी जानी है.................................

दौलत तो आनी जानी है, ना मन इसमें उलझाना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

 

ये पाप - पुण्य है खेल यहाँ,..................................

ये पाप - पुण्य है खेल यहाँ, जो करता है सो भरता है !

जो सत की राह चले वो तो, इस भवसागर से तरता है !

 

सारे बंधन हैं स्वप्न यहाँ..................................

सारे बंधन हैं स्वप्न यहाँ, मत जीवन व्यर्थ गवाँना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 21, 2015 at 8:34pm

आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी बहुत बहुत आभार !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 21, 2015 at 3:38pm

बहुत सुंदर रचना. बधाई आदरणीय हरिप्रकाश जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2015 at 1:03pm

सारे बंधन हैं स्वप्न यहाँ, मत जीवन व्यर्थ गवाँना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !----------------सुन्दर रचना आदरणीय  i

 

Comment by Shyam Narain Verma on January 21, 2015 at 11:10am
सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें
Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 9:44pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया ह्रदय को छू गई, आभार ! सादर

 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 9:09pm

आदरणीय मिथिलेश जी , आपकी बातों से दूगना आनंद मुझे भी आ गया और आपने जो त्रुटियाँ इंगित की हैं अभी ठीक करता हूँ ,  आपका आभार ,आपका धन्यवाद !

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 20, 2015 at 9:09pm

 

दौलत तो आनी जानी है.................................

दौलत तो आनी जानी है, नहीं मन इसमें उलझाना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

वाह खूब रचना है वाह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2015 at 8:49pm

आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी वाह क्या कमाल का गीत लिखा है. झूम गया हूँ आपके इस गीत को पढ़कर.... लय तो ऐसी कमाल है कि बस दिल से वाह वाह निकल गई. पूरा गीत 16-16 की मात्रा में बहुत सुन्दर सजा हुआ है, जहाँ मात्रा अधिक कम हुई उसे केवल एक शब्द अधिक या कम करके अथवा मात्रा अनुसार शब्दों का क्रम बदला है. इस गीत को मैंने इस तरह पढ़ा और गुनगुनाया है-

 

सुख-दुःख तो आते जाते हैं,  राही मत घबरा जाना रे !

जीवन की गहरी नदियाँ में, हँसकर पतवार चलाना रे !

 

हमने कुछ देखी रीत यहाँ,

श्रम से ही सब कुछ मिलता है !

ईमान –धरम के काँटों में,

तब फूल मुकद्दर खिलता है !

 दौलत तो आनी जानी है, ना मन इसमें उलझाना रे !

 

ये पाप - पुण्य है खेल यहाँ,

जो करता है सो भरता है !

जो सत की राह चले वो तो,  

इस भवसागर से तरता है ! 

सारे बंधन हैं स्वप्न यहाँ, मत जीवन व्यर्थ गवाँना रे !

 

आपके इस बेहतरीन गीत पर दिल से ढेर सारी बधाई स्वीकार करें.... ये गीत पढ़कर आज का दिन सुखद और सफल कर दिया.  सादर

 

 

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 20, 2015 at 8:34pm
जीवन में तो सबकुछ आना जाना है , जीवन स्वयं आना जाना है , फिर भी सब हस कर निभाना है ,
" जीवन की गहरी नदियों में, हँसकर पतवार चलाना रे ! "
बहुत सुन्दर सन्देश है यह , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, बधाई , इस सार गर्भित प्रस्तुति के लिए , सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 7:44pm

आदरणीय सुशील सरना सर ह्रदय से आभार आपका , आपके मार्गदर्शन, स्नेह की सदैव आकांक्षा है, सादर !

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