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साथ मेरे ज़िंदगी की …

साथ मेरे ज़िंदगी की …(एक रचना )

साथ  मेरे ज़िंदगी  की रूठी किताब रख देना
जलते चरागों में  बुझे  वो  लम्हात रख देना

रात भर सोती रही शबनम जिस आगोश में
रूठी बहारों में वो सूखा  इक गुलाब रख देना

कहते कहते रह गए  जो थरथराते से ये लब
साथ मेरी  धड़कनों  के वो जज़्बात रख देना

आज तक न दे सके जवाब जिन सवालों का
साथ मेरे  वो सिसकते कुछ जवाब रख देना

मिट गयी थी दूरियां  भीगी हुई जिस रात में
एक मुट्ठी  साथ  मेरे  वो  बरसात रख देना

तमाम शब  तन्हाई  में  जो  मेरे  करीब रहा
साथ मेरे वो  उदास  इक  माहताब रख देना

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by somesh kumar on January 1, 2015 at 8:47pm

भावनाओं की नदी बहा दी आप ने आदरणीय ,आप का एक शेर आप के लिए  

मिट गयी थी दूरियां  भीगी हुई जिस रात में 
एक मुट्ठी  साथ  मेरे  वो  बरसात रख देना


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2015 at 7:54pm

बहुत सुंदर रचना आदरणीय सुशील सरना जी बधाई स्वीकार करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 1, 2015 at 7:45pm
इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई
Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 7:43pm

मिट गयी थी दूरियां  भीगी हुई जिस रात में 
एक मुट्ठी  साथ  मेरे  वो  बरसात रख देना.......बहुत सुंदर प्रस्तुती आदरणीय  सरना जी ,सादर !

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on January 1, 2015 at 7:24pm

रात भर सोती रही शबनम जिस आगोश में
रूठी बहारों में वो सूखा  इक गुलाब रख देना... क्या सारगार्भित प्रतीकात्मक उक्ति है. हार्दिक बधाई हो आदरणीय..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 1, 2015 at 7:21pm

सरना जी

बहुत उम्दा i काबिले  तारीफ i

Comment by Sushil Sarna on January 1, 2015 at 4:30pm

आदरणीय   Shyam Narain Verma  जी  रचना पर आपके स्नेह का हार्दिक आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on January 1, 2015 at 4:09pm

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 

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