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समय बीतता गया... (विजय निकोर)

समय बीतता गया...

समय की आँधी क्रान्तियात्रा-सी

धुन्धले पड़ते

प्रतीक्षा और मृत्यु के सीमान्त

लड़खड़ाता साहस, विश्वास

ऐसे में स्नेह को आँधी में

दोनों हाथों से लुटा कर

कुछ मिलता है क्या

आत्मपीड़न के सिवा ?

अकेलापन

कसैलापन रसता

बचा रह जाता है

बीतती मुस्कान ओंठों पर

खाली बोतलों के पास

टूटे हुए गिलास-सी पड़ी ...

            -------

-- विजय निकोर

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by vijay nikore on July 16, 2014 at 7:11am

//बहुत सुंदर, सजीव सा चित्रण//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जितेन्द्र जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2014 at 1:04am

और आँख झपकती नहीं .. डूबती जाती है.. शिथिल पड़ते अंग लसरते चले जाते हैं.. फिर न उठने केलिए.. .

जिस भावदशा को आपने शब्दबद्ध किया है आदरणीय, वह तमस के उस स्वरूप को साझा करता है, जिसे मनोहारी भी कह सकते हैं. नैराश्य भी सुन्दर होता है, आदरणीय.. !.. . है न ?

Comment by vijay nikore on July 5, 2014 at 1:18pm

इस रचना पर आपकी उपस्थिति के लिए और सराहना के लिए आपका आभारी हूँ, आदरणीया सविता जी।

Comment by vijay nikore on July 5, 2014 at 1:16pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शिज्जु शकूर जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2014 at 7:35am

आदरनीय बड़े भाई विजय जी , जीवन की निराशाओं को आपने जो शब्द दिये हैं वो क़ाबिले तारीफ है । बहुत मार्मिक ! आपको दिली बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 3, 2014 at 10:20am

पुरानी यादें और अकेले पन के दर्द की जीती जागती तस्वीर आपकी ये रचना ,बहुत खूब ,बधाई आपको आ० विजय निकोर जी | 

Comment by Vindu Babu on July 3, 2014 at 1:18am

निराशा को क्या खूब शब्द मिले हैं। कम शब्दों में यथार्थ बयाँ किया है आपने आदरणीय।

//अकेलापन

कसैलापन रसता

बचा रह जाता है

बीतती मुस्कान ओंठों पर

खाली बोतलों के पास

टूटे हुए गिलास-सी पड़ी ...//...क्या बात है! बहुत सुंदर।

हार्दिक बधाई आपको इस सफ़ल रचना के लिए।

सादर

Comment by Priyanka singh on July 2, 2014 at 4:44pm

बेहद मार्मिक रचना 

इतना प्रेम और वो भी इस तरहा ....लगता है किसी से शिकायत है और वही शब्दों से इस रचना में उतर आई है 

बहुत खुबसूरत और दिल छु लेने वाली रचना है आदरणीय विजय सर ....आपकी सोच और लेखन को नमन .....

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:54pm

आदरनी निकोर जी/ आपकी दर्दीली रचना पर मेरी एक कविता समर्पित है /    आत्मपीडा में अनुभूति सुख की लिए

                                                                                                        दग्ध होता रहा अनुभवों में सदा

                                                                                                         सत्य ही उस करुण के ह्रदय कोश में

                                                                                                         पल रहा कोई जीवंत अनुराग  है i

                                                                                                        सादर i

Comment by Sushil Sarna on July 2, 2014 at 11:03am

आदरणीय विजय जी इस ह्रदयस्पर्शी रचना के लिए हार्दिक बधाई।  सरल शब्द संयोजन एवं सुंदर प्रवाह इसकी विशेषता है। 

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