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मैं कभी तुझसे बिछड़ने का न मंजर देखूँ

2122   2122  2122  22

मैं कभी तुझसे बिछुड़ने का न मंजर देखूँ

मछलियों से ना कभी ख़ाली समंदर देखूँ

 

कब जमीं आकाश दोनों इस जहाँ में मिलते

मैं ये  संगम तो सदा दिल के ही अन्दर देखूँ

 

हर सितारा  तेरी किस्मत का बुलंदी पर हो

 मैं  न कोई हार से टूटा सिकंदर देखूँ

 

झेल लूँ मैं वार  खुद तेरी परेशानी के  

जीस्त में गड़ता हुआ ग़म का न खंजर देखूँ

 

जिंदगी में काश कोई दिन न आये ऐसा

मैं मुहब्बत की जमीं की कोख  बंजर देखूँ

 

इक सदाकत ,रूह की पाकीज़गी हो जिसमे

मैं तेरे दिल में वही चाहत निरंतर देखूँ 

------------------------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 6, 2014 at 12:36am

जिंदगी में काश कोई दिन न आये ऐसा

मैं मुहब्बत की जमीं की कोख  बंजर देखूँ............बहुत सुंदर .दिल को छु गया

बहुत खुबसूरत गजल आदरणीया राजेश दीदी, हर एक शेर बहुत खूब. तहे दिल से बधाई आपको

 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 5, 2014 at 10:55pm

कब जमीं आकाश दोनों इस जहाँ में मिलते

मैं ये  संगम तो सदा दिल के ही अन्दर देखूँ

बहुत सुन्दर गजल। सुन्दर भाव
भमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2014 at 5:25pm

आ० कुंती जी, आपको ग़ज़ल के अशआर प्रभावित कर सके मेरा लिखना सफल हुआ आपकी जर्रानवाजी का तहे दिल से शुक्रिया. 

Comment by coontee mukerji on June 5, 2014 at 5:16pm

पूरी गज़ल प्यार केएक एक शब्द में पगी हुई....

जिंदगी में काश कोई दिन न आये ऐसा

मैं मुहब्बत की जमीं की कोख  बंजर देखूँ......कितनी सुंदर ख्यालात है.राजेश कुमारी जी, मुहब्बत से भरे दिल ही में ऐसी मधुर स्रोत फूटती है......सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2014 at 5:07pm

नरेन्द्र सिंह चौहान जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई बहुत- बहुत शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2014 at 3:19pm

आ० मीना पाठक जी इस होंसलाफ्जाई के लिए दिल की गहराई से शुक्रिया. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2014 at 3:11pm

आ० डॉ गोपाल नारायण जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ|तहे दिल से आभार आपका.सादर .

Comment by Meena Pathak on June 5, 2014 at 3:10pm

क्या बात है ... बेहतरीन गज़ल .. बधाई आप को आदरणीया राजेश कुमारी जी | सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 5, 2014 at 12:47pm

आदरणीया

बहुत अच्छी गजल कही आपने i  मक्ता तो लाजवाब है ही i शुभकामना सहित i

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