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बह्र : रमल मुसम्मन महजूफ

वज्न : २१२२, २१२२, २१२२, २१२

मध्य अपने आग जो जलती नहीं संदेह की,
टूट कर दो भाग में बँटती नहीं इक जिंदगी.

हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,

आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको,
कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी,

यूँ धराशायी नहीं ये स्वप्न होते टूटकर,
आखिरी क्षण तक नहीं बहती ये आँखों की नदी,

रात भर करवट बदलना याद करना रात भर,
एक अरसे से यही करवा रही है बेबसी.

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by umesh katara on April 19, 2014 at 8:39pm

लाजबाब अरुन जी वाहहहहहहहह 

आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको

कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी------वाह 
वाहहहहहहहहहह

Comment by बृजेश नीरज on April 19, 2014 at 8:10pm

वाह! बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल! सभी अशआर बहुत ही खूबसूरत हैं!

आपको बहुत-बहुत बधाई, अरुण भाई!

Comment by savitamishra on April 19, 2014 at 7:58pm


आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको,
कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी,.........खूबसूरत ग़ज़ल

Comment by coontee mukerji on April 19, 2014 at 7:01pm

बहुत बहुत सुंदर गज़ल......हार्दिक  बधाई.

Comment by वेदिका on April 19, 2014 at 6:55pm
वाह! क्या अशआर सहेजे है
बधाई आ0 अरुण अनंत जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 19, 2014 at 6:19pm

वाह्ह वाह... प्रिय अरुन शर्मा बहुत शानदार गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कही है|सभी अशआर सुन्दर हुए हैं ---एक परामर्श देना चाहूँगी

ये मिसरा यदि ऐसे लिखें तो ठीक न होगा?? --- आखिरी क्षण तक नहीं बहती ये आँखों  की नदी,-----आँखों और निगाहों में फर्क होता है 

बहुत- बहुत दाद कबूलें इस सुन्दर ग़ज़ल पे 
-

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 19, 2014 at 5:06pm

आदरणीय मुकेश भाई जी आपकी उत्साहवर्धक टिपण्णी पाकर मन प्रफुल्लित हो उठा, ग़ज़ल आपको मुकम्मल लगी लेखन कार्य सार्थक हुआ. बहुत बहुत धन्यवाद मित्र

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 19, 2014 at 5:05pm

हार्दिक आभार आदरणीया सरिता जी स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 19, 2014 at 4:47pm

आदरणीय अरुण जी
बहुत उम्दा और मुक़म्मल ग़ज़ल कही है आपने.
उम्दा बयानी का मुज़ाहिरा किया है आपने.
दिल खुश कर दिया आपने.. बहुत बहुत मुबारकबाद

हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,

रात भर करवट बदलना याद करना रात भर,
एक अरसे से यही करवा रही है बेबसी.  ..  क्या कहने..

Comment by Sarita Bhatia on April 19, 2014 at 3:49pm

बढ़िया अशआर 

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