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बताई बात मिलने की अगर तूँने जमाने को
बचेगा पास मेरे क्या बताओ फिर गँवाने को


न दिल को लगने पाएगा ये गम जुदाई का
तुम्हारी याद जो होगी हमें हँसने-हँसाने को


लगी सूंघने दुनिया तेरी खुशबू हवाओं में
लिखी जब गयी चिट्ठी किताबों में छुपाने को


किया फौलाद जैसा दुखों ने पालकर तन से
खुशी एक ही काफी हमें जी भर रूलाने को

गिरे अनमोल मोती जो सुख की कड़ी टूटी
सहेजे दामनों ने हैं नयन में फिर सजाने को

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2013 at 6:23pm

प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

मेहनत करें. ग़ज़ल के मूलभूत नियमों की ओर सचेष्ट हों. .. शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2013 at 6:27am

सभी प्रबुद्ध जानो का हार्दिक धन्यवाद ,

आप लोगों का इसी प्रकार स्नेह मिलता रहे यही कामना है .भाई वीनस जी आपका मार्गदर्शन सरआंखों पर . भविष्य में इस प्रकार कि त्रुटि नहीं होने पायेगी . निवेदन है कि इसके लिए कोई उपयुक्त शब्द हो तो सुझाएँ . 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 18, 2013 at 4:49pm

सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई ..वाकी आदरणीय वीनस जी ने स्पस्ट कर दिया है 

Comment by Abhinav Arun on November 18, 2013 at 7:03am

आ. श्री लक्ष्मण जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें !!

Comment by वीनस केसरी on November 18, 2013 at 3:12am

बताई बात मिलने की अगर तूँने जमाने को
बचेगा पास मेरे क्या बताओ फिर गँवाने को

सुन्दर प्रयास है भाई जी ...
ग़ज़ल के मूल नियमों पर खरी उतरने के लिए इस रचना को अभी और आंच दिखानी होगी ..

लगी सूंघने दुनिया यहाँ कुत्तों सी खुशबू को
लिखी जब गयी चिट्ठी किताबों में छुपाने को

दुनिया कुत्तों सा सूंघने लगी
घटिया उपमा देना ग़ज़ल की जबान के एतबार से ऐब मन गया है ... इससे अपनी रचनाओं को बचाईये ..

सादर
शुभकामनाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 17, 2013 at 8:15pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , सुन्दर भावों और विचारों से सजी आपकी रचना के लिये आपको बधाई !!!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 17, 2013 at 7:16pm

धामी जी

कल्पना के बहुवर्णी चित्र है

ऐसे ही लिखते रहें  i   स्नेह  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 17, 2013 at 5:37pm

भाव अच्छे हैं, प्रयास के लिये बधाई

कृपया ध्यान दे...

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