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ग़ज़ल - समुन्दर को डगर कर दूँ - पूनम शुक्ला

1222. 1222

सबा हाजिर अगर कर दूँ
कहानी इक अमर कर दूँ

अँधेरा घेरता फिर से
सितारों को खबर कर दूँ

हवा थोड़ी तुफानी है
इसे मैं बेअसर कर दूँ

कलम की रोशनाई से
फलक रंगीं अगर कर दूँ

ख़ला की हिकमती कैसी
अगर थोड़ी सहर कर दूँ

जरा सा वक्त तुम दे दो
जहन्नुम को न घर कर दूँ

चलूँगी राह जब अपनी
समुन्दर को डगर कर दूँ

हिकमती - उपाय

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 13, 2013 at 11:38pm

इस संयत प्रयास के लिए बधाई और शुभकामनाएँ

सतत रहें

Comment by विजय मिश्र on November 11, 2013 at 5:36pm
सराहनीय और सुंदर शब्द आबद्धता , साधुवाद पूनमजी .
Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 10, 2013 at 9:40pm

छोटी बह्र ...बड़ा कमाल .. बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 8:15pm

बहुत बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हुई है पूनम जी बधाई स्वीकारें

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 10, 2013 at 12:52pm

आदरणीय पूनम जी, क्या कहने! सुन्दर गजल प्रस्तुति। हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 10, 2013 at 9:26am

सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई.................

Comment by Poonam Shukla on November 9, 2013 at 9:20pm
आप सभी का हार्दिक आभार
Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 8:49pm

वाह वाह पूनम जी..... सभी शेर सुंदर बन पड़े हैं..... हार्दिक बधाई....

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 9, 2013 at 5:16pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है पूनम जी बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 9, 2013 at 4:49pm

अच्छी ग़ज़ल है बधाई स्वीकार करें

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