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ग़ज़ल : सूखते नल के आँसू टपकने लगे

बह्र : २१२ २१२ २१२ २१२

 

सूखते नल के आँसू टपकने लगे

देख छागल के आँसू टपकने लगे

 

भूख से चूक पत्थर गिरे याँ वहाँ

देखकर फल के आँसू टपकने लगे

 

था हवा की नज़र में तो बरसा नहीं

किंतु बादल के आँसू टपकने लगे

 

आइने ने कहा कुछ नहीं इसलिए

रात काजल के आँसू टपकने लगे

 

घास कुहरे से शब भर निहत्थे लड़ी

देख जंगल के आँसू टपकने लगे

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 9, 2013 at 11:24am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , बहुत कठिन रदीफ लिया है आपने , सुन्दर गज़ल के लिये बधाई !!!! और काफिया , रदीफ को सफलता से निबाहने के लिये अलग से ढेरों दाद !!!!!

Comment by umesh katara on November 9, 2013 at 8:15am

अच्छी गजल के लिये बधायी हो धर्मेन्द्र जी आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 8, 2013 at 10:02pm

अच्छी ग़ज़ल लिखी है धर्मेन्द्र जी बधाई आपको 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 8, 2013 at 9:03pm

aapne  bhi  aisee gazal jo kahee

meri aankho se aanso tapakne lage

sookhe nal me bhi aansoo agar aa gaye

to gazal ke bhi aansoo tapaskne lage

 

bhaijan thora aur jor lagaiye tab maja aayga  meri shubhkamnayein

Comment by annapurna bajpai on November 8, 2013 at 7:39pm

आ0 धर्मेंद्र सिंह जी खूबसूरत गजल के लिए आपको हार्दिक बधाई । 

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