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विवशता ( कविता )

मजदूर दिवस को समर्पित


विवशता ( कविता )

बड़ी देर से

इंतजार था कुत्ते को

रोटी के टुकड़े का

और जैसे ही

इंतजार समाप्त होने को आया

घट गई एक अनोखी घटना

मालिक के

रोटी फैंकते ही

एक कौआ

न जाने कहाँ से

उतरा जमीन पर

झट से रोटी को

दबाकर चोंच में

उड़ गया फुर्र से

कुत्ता बेतहाशा उसके पीछे दौड़ा

मगर उसकी दौड़-धूप भी

कोई रंग न लाई

हारकर

थककर

टूटकर

एक मजदूर की भाँति

विवश-सा होकर

वह बैठ गया

और उससे थोड़ी दूरी पर

वह कौआ

पेड़ की शाख पर

ऐसे ही बैठा था

जैसे बैठा हो मिल मालिक कोई .

दिलबाग विर्क

Views: 708

Comment

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Comment by दुष्यंत सेवक on May 3, 2012 at 4:27pm

majboori ko sundar shabdon mein bayaan kiya hai .. badhai sweekaren virk sahab

Comment by वीनस केसरी on May 2, 2012 at 11:33pm

वाह विर्क साहब बहुत सुंदर बिम्बित किया है

कविता खूब पसंद आई

बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 2, 2012 at 1:20pm

bhai dilbaag ji, saadar.

kitni mahatvpurna baat itni saadgi se kah di. badhai. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 2, 2012 at 9:38am

वह कौआ

पेड़ की शाख पर

ऐसे ही बैठा था

जैसे बैठा हो मिल मालिक कोई .

वाह वाह , विर्क जी, क्या कहने , इस कविता के माध्यम से आपने बहुत बड़ी बात कह दी है, रोटी किसी की किसी के पास है, बहुत बहुत बधाई आपको |

Comment by आशीष यादव on May 1, 2012 at 10:16pm

बहुत सुन्दर रूपक पेश किया आपने।
बेहतरीन रचना पर मेरी बधाई स्वीकार करें।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2012 at 3:50pm

इशारों-इशारों में बहुत कुछ कहा है आपने, भाई दिलबाग़ जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 1, 2012 at 12:49pm

बहुत बढ़िया कटाक्ष ..बहुत खूब 

कृपया ध्यान दे...

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