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असली -नकली . . . .

सोच समझ कर पुष्प पर, अलि होना आसक्त ।
नकली इस मकरंद पर  , प्रेम न करना व्यक्त ।।

गुलदानों में आजकल, सजते नकली फूल ।
सच्चाई के तोड़ते, नकली फूल उसूल ।।

गुलशन सूने से लगें, भौंरे लगें उदास ।
नकली फूलों से भला, कब बुझती है प्यास ।।

मरीचिका सी जिन्दगी, यहाँ प्यास ही प्यास ।
पतझड़ के परिधान में, मुस्काता मधुमास ।।

अब कागज के फूल से, गुलशन है गुलज़ार ।
नकली फूलों का नहीं, मुरझाता संसार ।।

सुशील सरना/ 2-10-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on October 17, 2022 at 5:43pm
आदरणीय महेन्द्र जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । सुझाव के लिए शुक्रिया सर ।
Comment by Mahendra Kumar on October 13, 2022 at 7:00pm

बढ़िया दोहे हैं आदरणीय सुशील सरना जी। ढेरों बधाई स्वीकार कीजिए।

नकली = नक़ली, जिन्दगी = ज़िन्दगी, कागज = काग़ज़।

सादर।

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2022 at 7:35pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Samar kabeer on October 4, 2022 at 4:28pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छे दोहे लिखे आपने , बधाई स्वीकार करें.

Comment by Sushil Sarna on October 3, 2022 at 9:05pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 3, 2022 at 5:58pm

आदरणीय सुशील कुमार सरना जी आदाब, वाह... क्या दर्शन है!

नकली फूलों के संदर्भ में शानदार और मनमोहक दोहे रचने के लिए बधाई स्वीकार करें। 

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