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स्वयं को तनिक एक बच्चा बना-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२


न दे साथ जग  तो अकेला बना
नया अपने दम पर जमाना बना।१।
*
थका हूँ जतन कर यहाँ मैं बहुत
कि घर मेरा तू ही शिवाला बना।२।
*
तुझे अपना कहते बितायी सदी
न  ऐसे तो पल  में  पराया बना।३।
*
यहाँ सच की बातें तो अपराध हैं
यही सोच खुद को न झूठा बना।४।
*
बड़ों के दिलों में भरा दोष अब
स्वयं को तनिक एक बच्चा बना।५।
*
बहुत दम है साथी कहन में मगर
नहीं अपने लहजे  को ताना बना।६।
*
यही जीभ  अपना  करे  गैर को
न अपनों को इस से पराया बना।७।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 519

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 4:11pm

आ. भाई विजय निकोर जी , सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति व स्नेह से मन हर्षित हुआ । हार्दिक आभार..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 4:09pm

आ. भाई दण्डपाणि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 30, 2021 at 8:23pm
आ.भाई समर जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए हार्दिक आभार ।
Comment by vijay nikore on September 30, 2021 at 12:52pm

गज़ल अच्छी बनी है...

हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on September 28, 2021 at 7:21pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब. ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है , बधाई स्वीकार करें I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 27, 2021 at 8:33pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , सराहना व सुझाव के लिए हार्दिक धन्यवाद।

सुझाव बेहतरीन है किन्तु उससे कहन का भाव बदल रहा है क्योंकि जमाने को नया बनाने व अपना बनाने में अंतर तो है ही । सादर..

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 27, 2021 at 5:45pm

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। मतले को थोड़ा वक़्त देने की ज़रूरत है.

एक सुझाव पेश करता हूँ, मतले का सानी मिसरा यूँ कर सकते हैं -

"ज़माने को अपना ज़माना बना"   सादर। 

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