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सर पर पिता का हाथ है जिसके बना हुआ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२


इज्जत हमारी उनसे ही पहचान जग में है
सच है हमारा तात से सम्मान जग में है।१।
*
वंदन उन्हीं के चरणों का करते हैं उठते ही
आशीष उन का ईश का वरदान जग में है।२।
*
मागें भला क्या ईश से मालूम हमको सब
माता पिता के रूप में भगवान जग में है।३।
*
सर पर पिता का हाथ है जिसके बना हुआ
वो सच स्वयं नसीब से धनवान जग में है।४।
*
हमको जहाँ के खेल का अनुभव नहीं कोई
जीना उन्हीं की सीख से आसान जग में है।५।
*
ये खेल ये खिलौने तो पलभर की हैं खुशी
हम ने तो पायी तात से मुस्कान जग में है।६।
*
निर्धन भले ही धन से मगर नेह से नहीं
सन्तान उन के वास्ते यूँ जान जग में है।७।


मौलिक /अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 554

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 22, 2021 at 10:31pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद ।

Comment by Aazi Tamaam on June 22, 2021 at 8:56pm

सादर प्रणाम आ धामी सर

बेहतरीन ग़ज़ल के लिये बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 22, 2021 at 11:54am

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 22, 2021 at 11:30am

आ. भाई समर जी,सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, और स्नेह के लिए आभार।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 22, 2021 at 11:14am

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, फ़ादर्स-डे पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आख़िरी शे'र ख़ास पसन्द आया। बधाई स्वीकार करें। सादर। 

Comment by Samar kabeer on June 21, 2021 at 6:30pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

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