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फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

ज़िन्दगी में सिर्फ़ ग़म हैं और तुम हो
आज फिर से आँखें नम हैं और तुम हो

लग रहा है अब मिलन संभव नहीं है
वक़्त से लाचार हम हैं और तुम हो

रात चुप, है चाँद तन्हा, साँस मद्धम
इश्क़ में लाखों सितम हैं और तुम हो

दिल की बस्ती में अकेला तो नहीं हूँ
नींद से बोझिल क़दम हैं और तुम हो

क्या बताऊँ किसलिये है 'ब्रज' परेशां
वस्ल के आसार कम हैं और तुम हो

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 22, 2021 at 11:25pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर जी संशय दूर करने के लिए।दरअसल पहले आंख रखा था लेकिन वो भी ठीक नही था।सुधार करता हूँ सादर

Comment by Samar kabeer on February 22, 2021 at 9:04pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'आज फिर से चश्म-ए-नम हैं और तुम हो'

इस मिसरे में 'चश्म' एक वचन है,और रदीफ़ का 'हैं' बहुवचन में,इस मिसरे को यूँ कह सकते हैं:-

'आज फिर से आँखें नम हैं और तुम हो'

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 20, 2021 at 8:31pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी आपके खूबसूरत शब्दों से अति प्रसन्नता का अनुभव हुआ..शुक्रिया आपका..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 20, 2021 at 8:30pm

आदरणीय धामी जी हार्दिक अभिनंदन एवं आभार...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 20, 2021 at 8:30pm

हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गुमनाम जी....

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 20, 2021 at 8:29pm

ग़ज़ल पसंदगी के लिए शुक्रिया भाई कृष मिश्रा जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 20, 2021 at 8:28pm

ग़ज़ल पे आपकी हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया मित्र आजी तमाम जी...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on February 20, 2021 at 10:06am

जनाब बृजेश कुमार जी आदाब, शानदार ग़ज़ल पेश की है आपने, शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 7:18pm

आ. भाई बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 19, 2021 at 6:43pm

वाह शानदार ग़ज़ल हुई है बधाई।
अच्छी लगी वाह। ...... 

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