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सामने आ तू कभी ख़्वाब में आने वाले....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1122 1122 22

सामने आ तू कभी ख़्वाब में आने वाले
क्या मिला तुझको मेरी नींद उड़ाने वाले (1)

ऐसा लगता है कि आने का इरादा ही नहीं
वर्ना महशर में भी आ जाते हैं आने वाले (2)

चंद लम्हे भी अगर बंद हुई हैं पलकें
आ ही जाते हैं नये ख़्वाब दिखाने वाले (3)

क्या ग़जब है कि नये लोग चले आए हैं
घर में पहले से ही थे आग लगाने वाले (4)

मैं इस उम्मीद में बस आज तलक ज़िंदा हूँ
लौट आएँगे कभी छोड़ के जाने वाले (5)

मैं कभी अपने ही वादे से मुकर जाता हूँ
भूल जाते हैं कभी मुझको बुलाने वाले (6)

अब तो लगता है कि सब भूल गए हैं मुझको
याद आते हैं बहुत मुझको भुलाने वाले (7)

पीछे हटता हूँ कभी उनकी मदद लेने से
खींच लेते हैं कभी हाथ बढ़ाने वाले (8)

*मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on December 15, 2020 at 10:53am

भाई  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 14, 2020 at 10:23pm

बहुतखूब बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय...

Comment by सालिक गणवीर on December 11, 2020 at 6:23pm

उस्ताद ए मुहतरम समर कबीर साहिब
आदाब

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ। सलामत रहें। 

Comment by Samar kabeer on December 11, 2020 at 3:14pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

दूसरे शैर में 22 को 112 लेने की इजाज़त है इस बह्र में ।

Comment by सालिक गणवीर on December 10, 2020 at 6:49pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभार। 

Comment by सालिक गणवीर on December 10, 2020 at 6:47pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर'   जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभार। 

Comment by सालिक गणवीर on December 10, 2020 at 6:46pm

आदरणीय dandpani nahak  जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभार। 

Comment by सालिक गणवीर on December 10, 2020 at 6:43pm

आदरणीय चेतन प्रकाश जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभार। दूसरे शैर के आखिरी अरकान में नहीं है लिखने से ग़ज़ल बेबह्र हो जाएगी मुहतरम ,इस बह्र में आख़िरी अरकान 22 /112 लेने की छूट है मुहतरम।

Comment by Chetan Prakash on December 9, 2020 at 9:03am

शुभ प्रभात , सलिक गणवीर भाई, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बघाई। लेकिन शेर न0. 7 भरती का प्रतीत हुआ। दूसरे शेर का ऊला मिसरे का आखिरी रुक़्न 22 फेलुन के बजाय फाइलुन 212 हो गया है, ही नहीं के स्थान पर नही है (112 ) कर लीजिए।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 8, 2020 at 4:16pm

जनाब सालिक़ गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

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