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सालिक गणवीर's Blog (15)

ग़ज़ल ( उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो....)

(221 2121 1221 212)

उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो

ख़ालिस की है तलब ये अदाकार कम करो

आगे जो सबसे है वो ये आदेश दे रहा

आराम से चलो सभी रफ़्तार कम करो

वो हमसे कह रहे हैं कि मसनद बड़ी बने

हम उनसे कह रहे हैं कि आकार कम करो

जो मेरे दुश्मनों को गले से लगा रहा

मुझसे कहा कि दोस्तोंं से प्यार कम करो

अपने घरों में क़ैद हैं , हर रोज़ छुट्टियाँ

किससे कहें कि अब तो ये इतवार कम करो

बाज़ार में तो…

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Added by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 7:30am — 8 Comments

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी

हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में

मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से

हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 

उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे

ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर…

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Added by सालिक गणवीर on June 30, 2020 at 8:00am — 12 Comments

ग़ज़ल ( ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं.....)

( 2122 2122 212 )

ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं

तूने समझा हमको इस क़ाबिल नहीं

जान मेरी कैसे ले सकता है वो

दोस्त है मेरा कोई क़ातिल नहीं

सारी तैयारी तो मैंने की मगर

जश्न में ख़ुद मैं ही अब शामिल नहींं

हमको जिस पर था किनारे का गुमाँ

वो भंवर था दोस्तो साहिल नहीं

सोच कर हैरत ज़दा हूँ दोस्तो

साँप तो दिखते हैं लेकिन बिल नहीं

देखने में है तो मेरे यार - सा

उसके होटों के किनारे तिल…

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Added by सालिक गणवीर on June 17, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( अभी जो है वही सच है....)

(1222 1222 1222 1222)

अभी जो है वही सच है तेरे मेरे फ़साने में

अबद तक कौन रहता है सलामत इस ज़माने में

तड़पता देख कर मुझको सड़क पर वो नहीं रूकता

कहीं झुकना न पड़ जाए उसे मुझको उठाने में

गले का दर्द सुनते हैं वो पल में ठीक करता है

महारत भी जिसे हासिल है आवाज़ें दबाने में

किसी दिन टूट जाएँगी ये चट्टानें खड़ी हैं जो

लगेगा वक़्त शीशे को हमें पत्थर बनाने में

अजब महबूब है मेरा जो पल में रुठ जाता है

महीने बीत…

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Added by सालिक गणवीर on June 13, 2020 at 2:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल ( कितनी सियाह रातों में.....)

( 2212 122 2212 122)

कितनी सियाह रातों में हम बहा चुके हैं

ये अश्क फिर भी देखो आंँखों में आ चुके हैं

गर आके देख लो तो गड्ढे भी न मिलेंगे

हाँ,लोग काग़ज़ों पर नहरें बना चुके हैं

अब खिलखिला रहे हैं सब लोग महफ़िलों में

मतलब है साफ सारे मातम मना चुके हैं

वो ख़्वाब सुब्ह का था इस बार झूठ निकला

ता'बीर के लिए हम नींदें उड़ा चुके हैं

अब पाप का यहाँ पर नाम-ओ-निशांँ नहीं है

सब लोग शह्र के अब गंगा नहा चुके…

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Added by सालिक गणवीर on June 9, 2020 at 4:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल ( दूर की रौशनी से क्या कहते..)

(2122 1212 22)

दूर की रौशनी से क्या कहते

था अंधेरा किसी से क्या कहते

जगमगाती सियाह रातों में

दर्द की चांदनी से क्या कहते

सारा पानी किसी ने रोका था

बेवजह हम नदी से क्या कहते

सामने उसके गिड़गिड़ाए थे

उसके खाता-बही से क्या कहते

अब वो हैवान बन गया तो फ़िर

हम उसी आदमी से क्या कहते

पी गए ख़ूं भी लोग सहरा में

आलमे-तिश्नगी से क्या कहते

तेरी गलियाँ तुझे मुबारक हो …

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Added by सालिक गणवीर on June 7, 2020 at 4:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)

(2122 1212 22/112)

शह्र में फ़िर बवाल है बाबा

ये नया द्रोहकाल है बाबा

एक तालाब अब नहीं दिखता

क्या यही नैनीताल है बाबा?

क्या इसे ही उरूज कहते हैं?

अस्ल में ये ज़वाल है बाबा

भूख हर रोज़ पूछ लेती है

रोटियों का सवाल है बाबा

आंख इतना बरस चुकी अब तो

आंसुओं का अकाल है बाबा

मैं अकेला ही लड़ पड़ा सबसे

देखकर वो निढाल है बाबा

क़ब्र के वास्ते जगह न रही

फावड़ा है…

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Added by सालिक गणवीर on May 31, 2020 at 8:00am — 19 Comments

ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)

नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं

बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैं

अभी जिसने रखा है घर से बाहर

उसी के दिल में रहता था कभी मैं

जिसे कहते हो तुम भी झोपड़ी अब

मिरा घर है वहीं पर था कभी मैं

वहाँ पर क़ैद कर रक्खा है उसने

जहाँ देता रहा पहरा कभी मैं

सड़क पर क़ाफिला है साथ मेरे

नहीं इतना रहा तन्हा कभी मैं

मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते

हवा के साथ उड़ जाता कभी…

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Added by सालिक गणवीर on May 24, 2020 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)

 (221 2121  1221 212)

अंधी गली के मोड़ पे सूना मकान है

तन्हा-सा आदमी अब इस घर की शान है

हमसे उन्होंने आज तलक कुछ नहीं कहा

हर बार उससे पूछा है जो बेज़बान है

हालात-ए- माज़ूर यक़ीनन हुये बुरे

ऊपर चढ़ाई है वहीं नीचे ढलान है

बदक़िस्मती का ये भी नमूना तो देखिये

गड्ढे नहीं मिले थे जहाँ पर खदान है

मरने के बाद भी तो फ़राग़त नहीं मिली

सारे बदन पे बोझ है मिट्टी लदान है

*मौलिक एवं…

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Added by सालिक गणवीर on May 21, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)

( 2122 2122 2122 )

हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की

काश हम भी काटते फसलें ख़ुशी की

अब चुरा लो शम्स की भी धूप सारी

कोई तो बदलो  ये सूरत तीरगी की

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में

नस्ल घटती जा रही है आदमी की

हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद सारे

कौन खींचेगा लकीरें रौशनी की

जो भी हो सागर मिलेगा तिश्नगी को

बाढ़ ले जाये हमें अब तो नदी की

आंखेंं फट जाएँगी हैरत से…

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Added by सालिक गणवीर on May 15, 2020 at 7:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल ( तिजारत कैसे की जाए.....)

1222 1222 1222 1222

तिजारत कैसे की जाए हुआ है फैसला जब से

बड़ी किल्लत है पानी की लहू सस्ता हुआ जब से

मशीनें अब यहाँ पर और महंगी क्यों नहीं होंगी?

वतन में मुफ़्त ही इंसान भी मिलने लगा जब से

हमारा शह्र छोटा था मगर मिलता नहीं था वो

हमें अक्सर बुलाता है नयी दिल्ली गयाा जब से

समय के साथ कम होगी यही हम सोच बैठे थे

ये दूरी कम नहीं होती मिटा है फासला जब से

नयी शक्लें दिखाता था कभी जब सामने आया

नहीं जाता…

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Added by सालिक गणवीर on May 9, 2020 at 5:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल ( नया ज़माना कभी न आया..)

(121 22 121 22 121 22  121 22)

नया ज़माना कभी न आया , पुरानी दुनिया बदल रही है

ज़मीन पैरों तले थी कल तक ,न जाने कैसे फिसल रही है

बुझा न पायेंगी आंधियाँ भी ,हवाओं से जिस की दोस्ती है

अभी तो शम्अ जवां हुई है ,अभी धड़ल्ले से जल रही है

किसी के अरमां मचल रहे हैं , हुई किसी की मुराद पूरी

यहाँ उठी है किसी की डोली, वहाँ से अरथी निकल रही है

निकल रहा है किसी का सूरज,अभी हुई दोपहर किसी की

हमारे दिन तो गुज़र चुके हैं , हमारी अब…

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Added by सालिक गणवीर on May 5, 2020 at 7:00am — 5 Comments

ग़ज़ल ( बेच कर ज़मीर उसको ....)

(212 1222 212 1222)

बेच कर ज़मीर उसको फ़ायदा हुआ होगा

ज़िंदगी में फिर उसके जाने क्या हुआ होगा

क़त्ल तो यक़ीनन था पर बयान आया है

फिर बहस छिड़ी है कि हादसा हुआ होगा

बदहवास पत्ते फिर ज़र्द पड़ गये सारे

कल ख़िज़ाँ के मौसम पर फैसला हुआ होगा

रौशनी में जंगल भी जगमगा रहा होगा

चांँद पेड़ की टहनी पर टंँगा हुआ होगा

बोझ से मांँ तसले के दोहरी हुई होगी

पीठ पर कोई बच्चा भी बंँधा हुआ…

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Added by सालिक गणवीर on April 22, 2020 at 9:30am — No Comments

एक ग़ज़ल

आज आंखें नम हुईंं तो क्या हुआ

रो न पाए हम कभी अर्सा हुआ



आपबीती क्या सुनाऊंगा उसे

आज भी तो है गला बैठा हुआ



ढूंढता हूँ इक सितारे को यहाँ

दूर तक है आसमां फैला हुआ



क्यों  क़रीने से रखें सामान को

घर को रहने दीजिये बिखरा हुआ



नींद  पलकों  पर  कहीं ठहरी हुई

ख़्वाब आंखों में वहीं सहमा हुआ



जी  रहा  हूँ  बस  इसी उम्मीद से

लौट  आएगा  समय  बीता हुआ



हादसे  ऐसे   भी  तो   होते   रहे…

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Added by सालिक गणवीर on April 6, 2020 at 8:29pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल

सुन  रहे  हैं  कि  वो  इक ऐसी दवाई देगा

जिससे  अंधे  को भी रातों में दिखाई देगा



प्यार  से  उसने  बुलाया है मुझे मक़्तल में

जानता हूँ   मैं जो  दावत   में  क़साई देगा



ऐसे चिल्लाओ कि आवाज़ वहाँ तक जाए

एक  दिन  तो  सभी  बहरों को सुनाई देगा



पास  रहता  हूँ  तो मुंह फेर के चल देता है

दूर  जाऊँगा  तो   आने   की   दुहाई  देगा



क़ैदख़ाने   में  उसी  ने  ही रखा सालों तक

जिसने   उम्मीद  जताई   थी   रिहाई  देगा



घुप   अंधेरे  से …

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Added by सालिक गणवीर on April 1, 2020 at 12:00pm — 5 Comments

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