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जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

2122 1122 1122 22

जिसको हम ग़ैर समझते थे हमारा निकला
उससे रिश्ता तो कई साल पुराना निकला (1)

हम भी हरचंद गुनहगार नहीं थे लेकिन
बे-क़ुसूरों में फ़क़त नाम तुम्हारा निकला (2)

हम जिसे क़ैद समझते थे बदन में अपने
वक़्त आया तो वो आज़ाद परिंदा निकला (3)

जान पर खेल के जाँ मेरी बचाई उसने
मैं जिसे समझा था क़ातिल वो मसीहा निकला (4)

दोस्तो जान छिड़कता था जो कल तक मुझ पर
आज वो शख़्स मेरे ख़ून का प्यासा निकला (5)

वक़्त के साथ बड़ा होगा यही सोचा था
दिल मगर आज भी बच्चे के ही जैसा निकला (6)

मैं कहाँ जाके करूँ उसकी शिकायत 'सालिक'
मैं जिसे अपना समझता था पराया निकला (7)

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on August 27, 2020 at 8:20pm

भाई आशीष यादव जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और हौसला अफजाई के लिए आपका शुक्रग़ुजार हूँ.

Comment by आशीष यादव on August 26, 2020 at 1:48am

बहुत खूब। बढ़िया गजल पर बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by सालिक गणवीर on August 20, 2020 at 5:42pm

मुहतरमा डिंपल शर्मा जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सादर .

Comment by Dimple Sharma on August 19, 2020 at 10:11pm

आदरणीय सालिक गणवीर जी नमस्ते खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें,पाँचवा शेर बहुत ख़ूब हुआ है विशेष बधाई।

Comment by सालिक गणवीर on August 17, 2020 at 7:34pm

भाई सुरेश नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सादर एवं सप्रेम.

Comment by सालिक गणवीर on August 17, 2020 at 7:33pm

आदरणीय समर कबीर साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.माज़रत चाहूूंंगा जनाब,अभी यह शैर हटा रहा हूँ.

Comment by Samar kabeer on August 17, 2020 at 4:41pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'एक ही दिन में मिरा ज़र्द हुआ है चहरा
जिस्म से ख़ून मगर कल तो ज़रा सा निकला'

ये शैर इस ग़ज़ल में भर्ती का लगा ।

Comment by नाथ सोनांचली on August 17, 2020 at 4:37pm

आद0 सालीक गणवीर जी सादर अभिवादन। बहुत उम्दः ग़ज़ल हुई है। शैर दर शैर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें। सादर

Comment by सालिक गणवीर on August 14, 2020 at 12:43pm

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद'साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on August 13, 2020 at 11:18pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है जनाब, आपको इस पर ख़ूब सारी दाद और हार्दिक बधाई।

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