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झूठ बोले हैं न जाने कितने.......ग़ज़ल- सालिक गणवीर

2122-1122-22/112
झूठ बोले हैं न जाने कितने
उसको आते हैं बहाने कितने (1)

मैं किसी से भी तो नाराज नहीं
आ गए लोग मनाने कितने (2)

अब भी लोगों के नई दुनिया में
हैं ख़यालात पुराने कितने (3)

एक भी लफ़्ज मुझे याद नहीं
याद आते हैं वो गाने कितने (4)

घर जला कोई बुझाने न गया
आ गए आग लगाने कितने (5)

साथ आया न निभाने कोई
रस्म आएंँगे निभाने कितने (6)

अब कहीं पर तू ठहर जा 'सालिक'
रोज़ बदलेगा ठिकाने कितने (7)

©मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on February 4, 2022 at 7:35am

आदरणीय  भाई  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
सादर प्रणाम
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2022 at 8:30pm

आ. भाई सालिक जी, सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by सालिक गणवीर on February 3, 2022 at 1:27pm

आदरणीय  Dayaram Methani  जी
सादर प्रणाम
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार।

Comment by Dayaram Methani on February 3, 2022 at 10:47am

आदरणीय सालिक गणवीर जी अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें। शेर क्रमांक 6 को एक बार देख ले। इसमें निभाने शब्द सानी और ऊला दोनों में आया है। सादर।

कृपया ध्यान दे...

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