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वह मिट्टी खोदता,ढेर लगाता। समझा जाता,राजा मिट्टी को उपजाऊ बना रहा है।समय गुजरता गया।कालांतर में नेवला राजा बना।खुदी हुई मिट्टी की सुरंगों से बाहरी अजगर आने लगे। आते पहले भी थे।डंसते,निकल जाते। अब नेवला उन्हें खा जाता।इलाके में ' हाय दैया 'मचाई गई कि अजगर ने इसे डंसा,तो उसे डंसा।कितने अजगर तमाम हुए,यह बात गौण थी।

पुराना राजा: राजा कर क्या रहा है?ये अजगर आ कैसे रहे हैं?

रा,जा:'उन्हीं सुरंगों से,जो तुमने खोदी है।

' तुम क्या कर रहे हो?'

' तुम्हारी सुरंगें भर रहा हूं।'नेवले ने कहा।

' तुम होते कौन हो मेरे मुंह लगनेवाले?' पुराना राजा अपने लिजलिजे दम पर ही सही,गुर्राया।

' केंचुआ नहीं हूं।'नेवले ने मुस्कुरा कर जवाब दिया।

" मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on July 4, 2020 at 8:47am

आभार आदरणीय विजय शंकर जी।

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 4, 2020 at 8:17am

बहुत गहरी और सामयिक गंभीर लघु - कथा , बहुत बहुत बधाई , आदरणीय मनन कुमार सिंह जी , सादर।

Comment by Manan Kumar singh on June 28, 2020 at 1:55pm

आदरणीय समर जी,नमन व आभार।

Comment by Samar kabeer on June 28, 2020 at 11:26am

जनाब मनन कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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