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झूठ

नहीं, नहीं
रहने दो
सच और झूठ की ये तकरार
सच में बेकार है
सत्य
जब उजागर होता है
तो आघात देता है
और झूठ जब उजागर होता है
तो शर्मिंदगी का शूल देता है
फिर क्यूँ मुझे
अपने सच और झूठ का स्पष्टीकरण देते हो
सच कहूँ
यदि आघात ही सहना है तो
मुझे ये झूठ अच्छा लगता है
कम से कम मौन पलों में
स्नेह का आवरण तो नहीं हटता
कोई स्वप्न मेघ तो नहीं फटता
स्पर्शों की आँधी
सत्य के चौखट पर
लहू लुहान तो नहीं होती
रहने दो
मुझे सच का
निर्मम चेहरा मत दिखाओ
मुझे
तुम्हारा स्निग्ध झूठ
बड़ा प्यारा लगता है
जी लेने दो मुझे
बंद पलकों के नशीले
इस झूठ में
जब तक बंद हैं ये
ये झूठ मुझे
सिर्फ़
सच लगता है
झूठ नहीं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on May 1, 2020 at 8:31pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'   जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2020 at 8:30pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2020 at 12:08pm

आ. भाई सुशील जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई । 

Comment by नाथ सोनांचली on April 29, 2020 at 6:08am

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बेहद उम्दा सृजन पर कोटिश बधाई। झूठ पर बढ़िया लिखा है आपने। सादर

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