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बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on July 29, 2017 at 8:10pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम खुर्शीद खेराड़ी जी ।
Comment by khursheed khairadi on July 29, 2017 at 9:11am
मोहतरम ज़नाब आरिफ़ साहब, बेहद उम्दा ग़ज़ल हुई है। तहेदिल से दाद क़बूल फर्मावें।
Comment by Mohammed Arif on July 27, 2017 at 7:46am
आली जनिब मोहतरम समर कबीर साहब ग़ज़ल पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मान बढ़ाने और सुख़न नवाज़ी का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Samar kabeer on July 25, 2017 at 6:42pm
जनाब मिहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश है ।
Comment by Mohammed Arif on July 25, 2017 at 5:28pm
आदरणीय आशुतोष जी बहुत दिनों के बाद आपका मेरी रचना पर आना हुआ । ग़ज़ल पर शिरकत का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Mohammed Arif on July 25, 2017 at 5:26pm
आदरणीय नरेंद्र सिंह जी ग़ज़ल पर शिरकत का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on July 25, 2017 at 5:25pm
आदरणीय नीरज कुमारजी ग़ज़ल में का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Niraj Kumar on July 25, 2017 at 5:03pm
आदरणीय मोहम्‍म्‍द आरिफ साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. ये शेर बहुत अच्छा लगा :
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
सादर
Comment by narendrasinh chauhan on July 25, 2017 at 4:58pm
बहुत ही उम्दा ग़ज़ल,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 25, 2017 at 4:42pm

आदरणीय आरिफ जी अच्छी ग़ज़ल है इस रचना के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं सादर 

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